अभी-अभी उतरी एक ताज़ा ग़ज़ल 2 –

रास्ते ऐसे चुनो कि मज़िलों के पार जाने की गुंजाइश रहे।
ज़िंदगी ऐसे जियो कि हर कहीं तुम्हारी फ़रमाइश रहे।
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हम उड़े कहीं भी विराट फलक के किसी भी छोर पर
लेकिन धरती माँ के आँचल में ही अपनी रिहाइश रहे .
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जिनकी आवाज़ व्यवस्था के शीर्ष तक नहीं पहुँच सकती
देखभाल को व्यवस्था को उनके भी दुःख-ज़रूरतों की पैमाइश रहे।
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सभी मनुष्य-जीव -जंतु-वनस्पतियाँ धरती माँ की संतान हैं ,
हमारे बीच उस सार्वभौमिक रिश्ते की गर्माइश रहे।
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जान से भी प्यारे रिश्तों की डोर महज़ विश्वास है,
ऐसे ख़ूबसूरत रिश्तों के बीच न कभी ख़याले आज़माइश रहे ।
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हममें पूरी धरती पर ख़ुशी फैलाने की हैं अनंत शक्तियाँ
क्यों न ये जीवन उन्हीं शक्तियों की मुकम्मल नुमाइश रहे।
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जिस नूर से रोशन रही धरती व सारे अवतार-पैग़म्बर
उसी नूर की हमारे दिलों में भी मुसलसल पैदाइश रहे।
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-गिरीश पाण्डे
17 जनवरी 2020
अर्वायन , लॉस एंजल्ज़
कैलिफ़ोर्न्या , यू. एस.ए.

Bindesh Yadavhttps://untoldtruth.in
CEO& Owner of Untold Truth "Stop worrying what you have been Loss,Start Focusing What You have been Gained"

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