जब संविधान का मसौदा तैयार किया जा रहा था, तो राजेंद्र प्रसाद जैसे कई लोगों ने जोर देकर कहा कि वोट का अधिकार कुछ 2% आबादी तक ही सीमित होना चाहिए — शिक्षित और धनिक वर्ग के लिए !!!

जब संविधान का मसौदा तैयार किया जा रहा था, तो राजेंद्र प्रसाद जैसे कई लोगों ने जोर देकर कहा कि वोट का अधिकार कुछ 2% आबादी तक ही सीमित होना चाहिए — शिक्षित और धनिक वर्ग के लिए !!!
और सबसे बड़े नेताओं जैसे जवाहरलाल गाजी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी (वह संविधान सभा में नहीं थे) ने चुपचाप इस प्रस्ताव का समर्थन किया।
दुरात्मा गांधी ने भी इस “सीमित मतदान अधिकार” प्रस्ताव का समर्थन किया था, हालांकि वह लंबे समय तक जीवित नहीं रहे।

*इस विचार का विरोध करने वाला एकमात्र व्यक्ति *बाबासाहेब अम्बेडकर थे।
महात्मा अम्बेडकर* ने इस मुद्दे को इतना बड़ा मुद्दा बना दिया कि यदि सार्वभौमिक मताधिकार नहीं दिया जाता, तो सभी नेता कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के सामने उजागर हो जाते (जिनमें से अधिकांश आदर्शवादी और लोकतांत्रिक थे)।

तो आखिरकार जवाहर लाल गाजी, श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि को “प्रत्येक आदमी, एक वोट” से सहमत होना पड़ा।
लेकिन वोट की शक्ति को कमजोर करने के लिए, उन्होंने सुनिश्चित किया कि सभी शक्तियां न्यायपालिका के साथ मिल जाए, और संसद कमजोर हो जाए। इसलिए उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि संविधान जनमत संग्रह की अवधारणा/प्रक्रिया से वंचित रहे !! और जुडिशल रिव्यू की अवधारणा को लागू किया गया था ताकि मुट्ठी भर जज करोड़ों मतदाताओं के फैसले को रद्द कर सकें। और अंत में, 1956 में, बड़े नेताओं ने जूरी सिस्टम को भी मार दिया, जिससे आम जनता की बची-खुची शक्ति को भी समाप्त कर दिया गया।

अन्य शब्दों में, ‘प्रत्येक आदमी, एक वोट” कानून आया, लेकिन उनके करोड़ों वोटों को केवल 20-25 सर्वोच्च न्यायाधीशों द्वारा खारिज किया जा सकता है !!!

अतः लोकतंत्र अधूरा है पूरा बनाने के लिए वोट बदलने की ताकत की मांग करनी चाहिए |

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#JuryCourt

Bindesh Yadavhttps://untoldtruth.in
CEO& Owner of Untold Truth "Stop worrying what you have been Loss,Start Focusing What You have been Gained"

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