टावर ढहाने वाले चेतन दत्ता को नहीं आती थी नींद: बोले- जिस दिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश हुआ, तभी सोचा ये काम मुझे मिलना चाहिए

टावर ढहाने वाले चेतन दत्ता को नहीं आती थी नींद: बोले- जिस दिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश हुआ, तभी सोचा ये काम मुझे मिलना चाहिए सुपरटेक एमरॉल्ड के 102 मीटर ऊंचाई वाले दो टावरों को ध्वस्त करते वक्त 6 इंजीनियर ऐसे थे, जो सबसे नजदीक खड़े थे। इनमें 4 इंजीनियर दक्षिण अफ्रीका की जे डिमोलिशन और 2 भारत की एडिफिस कंपनी के थे। नोएडा पुलिस या प्रशासन के किसी भी बड़े अफसर तक को इस एरिया में आने की इजाजत नहीं थी । दुनिया के जाने-माने ब्लास्टर में से एक, जो. ब्रिंकमैन को ब्लास्ट का ट्रिगर का बटन दबाना था। मगर, भारतीय मौका मिला चेतन दत्ता को, जो भारतीय ब्लास्टर हैं। 49 साल के चेतन दत्ता मूल रूप से हरियाणा के हिसार के रहने वाले हैं। इन्हें ब्लास्टिंग फील्ड में करीब 20 साल का अनुभव है। साल 2012 में इन्हें डायरेक्टोरेट जनरल माइनिंग सेफ्टी से ब्लास्टर का सर्टिफिकेट मिल चुका है।

ब्लास्ट के बाद चेतन दत्ता क्या बोले, पढ़िए…

आगे की कहानी ब्लास्टर एडिफिस चेतन दत्ता की जुबानी “जिस दिन सुप्रीम कोर्ट ने सुपरटेक के टावरों को गिराने का आदेश दिया, उसी दिन हमारे एक्सप्लोसिव डीलर्स के वॉट्सऐप ग्रुप पर इसकी चर्चा शुरू हो गई। कितना एक्सप्लोसिव लगेगा, कितने दिन लगेंगे? इस पर ग्रुप में चर्चा हो रही थी। उसी वक्त कहीं न कहीं मेरे दिमाग में ये ख्याल आया कि ये काम तो मुझे मिलना चाहिए। मुझे आभास नहीं था कि टावरों के धमाके वाला बटन मैं ही दबाउंगा। तीन दिन पहले मुझे इसकी जानकारी हुई। इसके बाद से मैं मीडिया में हाई लाइट हो गया। जब मैं गेस्ट हाउस पर जाता था, तो नींद नहीं आती थी। मुझे कई बार डर भी लगता था, यह सोचकर कि लोगों को मुझसे बहुत सारी उम्मीदें हो गई हैं। दोस्त मुझे मैसेज करते थे कि तुझे ये काम हर हाल में करना है। 28 अगस्त को हम 6 इंजीनियर दोनों टावरों से सिर्फ 70 मीटर दूर खड़े थे। आधे घंटे पहले जब सायरन बजा, उसके बाद हम एक-दूसरे से बात नहीं कर पा रहे थे। सिर्फ एक-दूसरे के चेहरे देख रहे थे।

अंकल (जो. ब्रिंकमैन) मेरे बराबर में खड़े थे। जैसे ही घड़ी में 2.30 बजे, अंकल ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा- बेटा पुश द बटन। बटन दबाते ही तेज आवाज हुई। मैं जमीन से उठ खड़ा हुआ। मैंने बिल्डिंग की तरफ देखा। वहां बिल्डिंग नहीं थी, सिर्फ धूल का गुबार था। कुछ चिंताएं थीं । उन चिंताओं को देखते हुए हमने धूल बैठने का इंतजार नहीं किया। जेब से मास्क निकालकर बिल्डिंग की तरफ दौड़ लगा दी। सबसे पहले हम एमरॉल्ड कोर्ट पहुंचे, जहां दोनों बिल्डिंग गिरी हुई थीं। सिर्फ एक मामूली नुकसान एटीएस विलेज सोसाइटी की तरफ हुआ, जहां 3-4 मीटर दीवार टूटी थी। हमने जैसा सोचा, वैसा ही सब कुछ हुआ। इस ब्लास्ट के करीब 5 मिनट बाद हम लोग रो रहे थे। वो खुशी के आंसू थे। क्योंकि ये डिमोलेशन देश का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट था । “

पढ़िए क्या कहते हैं एडिफिस के प्रोजेक्ट मैनेजर मयूर मेहता “इतने बड़े डिमोलेशन का ये हमारा पहला प्रोजेक्ट था। इसलिए बहुत सारी चिंताएं थी। जैसे ही ब्लास्ट का बटन दबा, करीब 9-10 सेकंड में दोनों बिल्डिंग वॉटर फॉल की तरह नीचे आ गईं। हम खुश हो गए। बस डर था बराबर वाली एटीएस विलेज सोसाइटी का। हम निश्चित करना चाहते थे कि धमाके के बाद दोनों बिल्डिंग एक निश्चित एरिया में गिरें । आखिर वैसा ही हुआ । हमने ब्लास्ट से जितना नुकसान सोचा था, उससे भी कम हुआ। यानी पूरी प्लानिंग कामयाब रही। बिल्डिंग गिरने के बाद आसपास की सोसाइटी पर लगाई गई फाइबर शीट हटा दी गई है। मलबा हटाने का काम भी शुरू कर दिया गया है।’ “

2 ब्लैक बॉक्स निकाले, 8 मलबे में दबे सुपरटेक एमरॉल्ड के दोनों टावरों को गिराते वक्त कैसा कंपन महसूस किया गया, इसकी रिपोर्ट ब्लैक बॉक्स एक हफ्ते बाद देगा। बिल्डिंग में 10 ब्लैक बॉक्स लगाए गए थे। इसमें से अभी तक दो बॉक्स मिल पाए हैं। बाकी बॉक्स मलबे में दबे हैं। जैसे-जैसे मलबा हटेगा, वैसे-वैसे ब्लैक बॉक्स बाहर निकलेंगे। सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट ( CBRI ) रुड़की के 8 और सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ माइनिंग एंड फ्यूल रिसर्च एंड फ्यूल रिसर्च (CIMFR) धनबाद के 2 वैज्ञानिकों ने ब्लास्ट का अध्ययन करने के लिए दोनों टावरों में 10 ब्लैक बॉक्स लगाए थे। बिल्डिंग गिरते वक्त दोनों टावरों के अंदर कैसा नजारा था, कितना कंपन महसूस हुआ? किस तरह पिलर टूटे और किस तरह ब्लास्ट हुए … यह सब ब्लैक बॉक्स में कैद हो गया है। ब्लैक बॉक्स इसलिए भी लगाए गए थे, ताकि इनकी इमेज प्रोसेसिंग से भविष्य में रिसर्च किया जा सके।

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