डॉक्टर बोले- पति संग सोने में दर्द नहीं होता?: बिना बेहोश किए ऑपरेशन किया, पति कहते थे ‘बेटा हो गया नसबंदी करा लो’

डॉक्टर बोले- पति संग सोने में दर्द नहीं होता?: बिना बेहोश किए ऑपरेशन किया, पति कहते थे ‘बेटा हो गया नसबंदी करा लो’ ‘मुझे ऑपरेशन टेबल पर लिटाया। पेट पर ठंडा जेल जैसा कुछ लगाया और फिर कट लगा दिया। मैं दर्द से चीख पड़ी, लगा जान निकल गई। ऊपर से डॉक्टर साहब मुझ पर ही बरस पड़े। बोलने लगे, ‘सर्जरी करवाने में दर्द हो रहा है और पति के साथ सोने में दर्द नहीं होता?’

उन्होंने चार-पांच लोगों को बुलाया। सबने मेरा हाथ-पैर पकड़ा, मुंह दबाया और दोबारा चीरा लगा दिया। एक महीना बीत गया, लेकिन दर्द नहीं गया। टांकों में मवाद भर गया है। ठीक से चल नहीं पा रही। घर वालों को भी लगता है मैं नौटंकी कर रही हूं।’ इतना कहते-कहते प्रतिमा की आंखें डबडबा जाती हैं। प्रतिमा बिहार के खगड़िया जिले के अलौली प्रखंड की रहने वाली हैं। वे उन 23 महिलाओं में से एक हैं, जिनका आरोप है कि बिना बेहोश किए ही उनकी नसबंदी कर दी गई।

इन्हीं महिलाओं से मिलने मैं दिल्ली से पटना होते हुए करीब 1250 किलोमीटर का सफर करके अलौली पहुंची….

लोगों से पता पूछने के बाद मैं प्रतिमा के घर पहुंची। गेट पर आकृति ब्यूटी पार्लर नाम से एक बोर्ड लगा है। अंदर कमरे में बड़ा सा आईना लगा है। मेकअप के सामान रखे हैं। दूसरी तरफ धूल फांकती एक सिलाई मशीन पड़ी है। पास में तख्त पर बिना सिले कपड़ों के ढेर और कतरन पड़े हैं। 30 साल की प्रतिमा पार्लर चलाती हैं। सर्जरी के बाद से काम ठप पड़ा है। राजीव कुमार, प्रतिमा के पति हैं। गांव में खेती-किसानी करते हैं। मैं पूछती हूं- प्रतिमा कहां हैं? जवाब मिलता है- अपने मायके मुंगेर गई है। राजीव से बातचीत की कहानी आगे पताऊंगी। यहां से 50 किलोमीटर का सफर करके प्रतिमा से मिलने मुंगेर पहुंचती हूं। परिवार के लोग बताते हैं कि वह कई दिनों से बेड पर पड़ी है। बाहर नहीं निकलती है। मैं अंदर हूं तो प्रतिमा बेड से उतरकर कुर्सी पर बैठ जाती हैं।

मैं पूछती हूं- तबियत कैसी है?

जवाब मिलता है- ‘टांके कट गए हैं, लेकिन उस जगह पर मवाद बन गया है। दवाई खा ही रही हूं। सात हजार से ज्यादा रुपए इलाज में लग गए हैं। ना चल-फिर पा रही हूं और ना काम कर पा रही हूं।’

आप सिलाई करती हैं?

जब से ऑपरेशन कराया, तब से एक कपड़ा नहीं सिल पाई। लोग आते हैं और आधे सिले कपड़े देखकर लौट जाते हैं। पार्लर भी बंद पड़ा है। अब मुझे एहसास हो रहा है कि ऑपरेशन कराकर बड़ी गलती कर दी।

उस दिन क्या हुआ था?

12 नवंबर, दोपहर 2 बजे पति मुझे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र छोड़ आए। ऑपरेशन रूम में चार बेड पड़े थे। तीन महिलाओं का ऑपरेशन किया जा रहा था। वे दर्द से चीख रही थीं। मैं डर गई, अंदर जाने से मना करने लगी। तब नर्स ने कहा कि ये महिलाएं नशा करती हैं, इसलिए इन्हें दर्द हो रहा है। तुम नशा थोड़े करती हो कि तुम्हें डरने की जरूरत है। कुछ नहीं होगा चिंता मत करो। मैंने सोचा नर्स कह रही हैं तो सही ही कह रही होंगी। मैं नशा नहीं करती, तो मुझे दर्द क्यों होगा। थोड़ी देर बाद डॉक्टर आए। मुझे लगा वे ऑपरेशन करन से पहले कोई सुई देंगे। मुझे बेहोश करेंगे। उन्होंने आते ही मुझे लेटने को बोल दिया। पेट पर ठंडा जेल जैसा कुछ लगाया और झट से चीरा मार दिया। मैं जोर से चीखने लगी। डॉक्टर को रोकना चाहा, लेकिन वो नहीं रुके।

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