तवांग पर आंखे क्यों गड़ाए बैठा है चीन: यहां से भड़क सकता है तिब्बत विद्रोह, इंडियन आर्मी के मिसाइल निशाने पर सीधा बीजिंग

तवांग पर आंखे क्यों गड़ाए बैठा है चीन: यहां से भड़क सकता है तिब्बत विद्रोह, इंडियन आर्मी के मिसाइल निशाने पर सीधा बीजिंग 21 नवंबर 1962 की बात है। चीन ने भारत के खिलाफ एकतरफा सीजफायर का ऐलान किया। इसी के साथ भारत-चीन के बीच चल रहे एक महीने लंबे युद्ध का अंत हो गया। उस वक्त तक चीन पश्चिमी क्षेत्र में अक्साई चिन और पूर्वी क्षेत्र में अरुणाचल प्रदेश के कई हिस्सों पर कब्जा कर चुका था। सीजफायर के ऐलान के बाद चीन ने अक्साई चिन पर तो कब्जा बरकरार रखा, लेकिन अरुणाचल प्रदेश में मैकमोहन लाइन से 20 किलोमीटर पीछे हट गया।

अरुणाचल से पीछे हटने पर लगा कि चीन अब यहां हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन 1980 में चीन ने फिर से भारत के नॉर्थ-ईस्ट में लगभग 90,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर दावा करना शुरू किया। 9 दिसंबर 2022 की रात एक बार फिर से चीन के सैनिकों इसी अरुणाचल प्रदेश के तवांग में घुसने की कोशिश की, हालांकि इंडियन आर्मी ने उन्हें वापस खदेड़ दिया।

अरुणाचल प्रदेश पर चीन नजरें क्यों गड़ाए है और भारत अरुणाचल प्रदेश से चीन का कितना नुकसान कर सकता है….

अरुणाचल प्रदेश पर चीन नजरें गड़ाए क्यों बैठा है?

अरुणाचल प्रदेश पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा राज्य है। नार्थ और नॉर्थ वेस्ट में तिब्बत, वेस्ट में भूटान और ईस्ट में म्यांमार के साथ यह अपनी सीमा साझा करता है। अरुणाचल प्रदेश को पूर्वोत्तर का सुरक्षा कवच कहा जाता है।

चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताता है। उसका दावा तो पूरे राज्य पर है, लेकिन उसकी जान तवांग जिले पर अटकी है। तवांग अरुणाचल के नॉर्थ-वेस्ट में हैं, जहां पर भूटान और तिब्बत की सीमाएं हैं।

अरुणाचल प्रदेश पर चीन की टेढ़ी नजर के पीछे ये 3 बड़ी वजहें हैं….

1. युद्ध के लिहाज से बेहद अहम लोकेशन तवांग में चीन की दिलचस्पी सामरिक वजहों से है,

क्योंकि यह भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्ट्रैटजिक एंट्री दिलाता है। तवांग तिब्बत और ब्रह्मपुत्र वैली के बीच कॉरिडोर का एक महत्वपूर्ण बिंदु है। तवांग के नॉर्थ में महत्वपूर्ण बुम ला दर्रा है, जो भारत के तवांग जिले और चीनी कब्जे वाले तिब्बत के बीच एक सीमा पास है। संयोग से 1962 में चीनी सैनिकों ने भारत पर हमला करने के लिए इसी दर्रे का इस्तेमाल किया था।

2. तिब्बत में चीन के खिलाफ विद्रोह का केंद्र बन सकता है तवांग मठ

तवांग में ही तवांग मठ भी है। यह दुनिया में तिब्बती बौद्ध धर्म का दूसरा सबसे बड़ा मठ है। पांचवें दलाई लामा के सम्मान में साल 1680-81 में मेराग लोद्रो ग्यामत्सो ने इस मठ की स्थापना की थी। चीन का दावा है कि मठ इस बात का सबूत है कि यह जिला कभी तिब्बत का था। चीन अरुणाचल पर अपने दावे के समर्थन में तवांग मठ और तिब्बत में ल्हासा मठ के बीच ऐतिहासिक संबंधों का हवाला देता है। इस तथ्य के बावजूद कि 1914 के शिमला सम्मेलन में एक तिब्बती प्रतिनिधि के साथ समान स्तर पर एक चीनी प्रतिनिधि भी शामिल हुआ था। इसी दौरान मैकमोहन लाइन खींची गई थी, जो भारत के पूर्वी क्षेत्र को तिब्बत से अलग करती है। इसने स्पष्ट रूप से भारत और तिब्बत के बीच सीमा को स्पष्ट किया है।

तवांग तिब्बती बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। इसी के चलते अरुणाचल के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में रहने वाली कुछ जनजातियों का तिब्बत के लोगों से कल्चरल कनेक्शन यानी सांस्कृतिक संबंध है। मोनपा आदिवासी आबादी तिब्बती बौद्ध धर्म को मानती है और तिब्बत के कुछ क्षेत्रों में भी यह मौजूद है। चीन को डर है कि अरुणाचल में इन जातीय समूहों की उपस्थिति किसी समय बीजिंग के खिलाफ लोकतंत्र समर्थक तिब्बती आंदोलन को जन्म दे सकती है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर लिखने वाली न्यूज वेबसाइट द डिप्लोमैट ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि तवांग मठ ही वह जगह है, जहां 1959 में चीन से भागने के बाद वर्तमान दलाई लामा हफ्तों तक रुके थे। इसलिए चीन के दृष्टिकोण से यह चीनी शासन के तिब्बती प्रतिरोध की जगह है। चीन का मानना है कि तिब्बत में यदि कभी चीन सरकार के खिलाफ विद्रोह होगा तो तवांग इसका प्रमुख केंद्र होगा। 1959 में चीन जब तिब्बत पर कब्जा कर रहा था, तब दलाई लामा तवांग के रास्ते ही भारत में आए थे और कुछ समय के लिए तवांग मठ में रहे।

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