भारत का भौतिक स्वरूप 1

जैसा कि आप जानते हैं कि भारत में भी स्थल आकृतियों वाला एक विशाल देश हैं आप किस प्रकार के क्षेत्र/ भूभाग में रहते हैं? यदि आप भारत के मैदानी क्षेत्र में रहते हैं तो आप वहां के दूर तक फैले विशाल मैदानों से परिचित होंगे और यदि पर्वतीय क्षेत्र के निवासी हैं तो आप भारत के पर्वतीय ढलान और घाटियों से बड़ी बात परिचित होंगे। वास्तव में, हमारे देश में हर प्रकार की भू-आकृतियां पाई जाती है जैसे पर्वत, मैदान, मरुस्थल, पठार तथा दीप समूह। आप यह सोच रहे होंगे कि यह विभिन्न प्रकार की भू आकृतियों कैसे बनी? अब हम भारत के भू आकृतियो की विशेषताएं तथा उनकी संरचना के बारे में जानेंगे।

यहां विभिन्न प्रकार की शोले पाई जाती है जिनमें से कुछ संगमरमर की तरह कठोर होती है जिसका प्रयोग ताजमहल के निर्माण में हुआ है एवं कुछ सेलखड़ी की तरह मुलायम होती है जिसका प्रयोग टेल्कम पाउडर बनाने में होता है एक स्थान से दूसरे स्थान पर मृदा के रंगों में भिन्नता पाई जाती है। क्योंकि मृदा विभिन्न प्रकार की शैलों से बनी होती है क्या आपने कभी इन विविधताओं के कारणों के बारे में सोचा है इनमें से अधिकतर विविधताएं सेल के निर्माण में विभिन्नता के कारण होती है।

भारत का विशाल मैदान :-

भारत एक विशाल भूभाग है इनका निर्माण विभिन्न भूगर्भीय कालों के दौरान हुआ है जिसने इसके उच्चावचों को प्रभावित किया है। भूगर्भीय निर्माणों के अतिरिक्त कई अन्य प्रक्रियाओं जैसे अपक्षय, अपरदन तथा निक्षेपण के द्वारा वर्तमान उच्चावचों का निर्माण तथा संशोधन हुआ है।कुछ प्रमाणों पर आधारित सिद्धांतों की सहायता से भूगर्भ शास्त्रियों ने इन भौतिक आकृतियों के निर्माण की व्याख्या करने की कोशिश की है इसी तरह का एक सर्वमान्य सिद्धांत, प्लेट विवर्तनिक का सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी के ऊपर ही पर पट्टी सात बड़ी एवं कुछ छोटी प्लेटो से बनी है।

प्लेटो की गति के कारण प्लेटों के अंदर एवं ऊपर की ओर स्थित महाद्वीपीय शैलों में दबाव उत्पन्न होता है।

ज्वालामुखी की क्रियाएं :-

इसके परिणाम स्वरूप वलन, भ्रंशीकरण तथा ज्वालामुखी क्रियाएं होती हैं। सामान्य तौर पर इन प्लेटों की गतियां को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है।कुछ फ्लैट दे एक दूसरे के करीब आती हो और अभिसारी परिसीमा का निर्माण करती हैं जबकि कुछ प्लेट एक दूसरे से दूर जाती है और अपसारी परिसीमा का निर्माण करती है।जब दो प्लेट एक दूसरे के करीब आती है तब या तो वे टकराकर टूट सकती है या एक प्लेट फिसल कर दूसरी प्लेट के नीचे जा सकती है कभी-कभी वे एक दूसरे के साथ सीधी दिशा में भी गति कर सकती हैं और रूपांतर परिसीमा का निर्माण करती है।

इन प्लेटों में लाखों वर्षों से हो रही गति के कारण महाद्वीपों की स्थिति तथा आकार में परिवर्तन आया है भारत की वर्तमान स्थलाकृति का विकास भी इस प्रकार की गतियों से प्रभावित हुआ है।सबसे प्राचीन भूभाग अर्थात प्रदीपीय भाग गोंडवाना भूमि का एक हिस्सा था। गोंडवाना भूभाग के विशाल क्षेत्र में भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका तथा अंटार्कटिका के क्षेत्र शामिल थे। संवहनी धाराओं ने भूपर्पटी को आने टुकड़ों में विभाजित कर दिया और इस प्रकार भारत ऑस्ट्रेलिया की प्लेट गोंडवाना भूमि से अलग होने के बाद उत्तर दिशा की ओर प्रभावित होने लगी। उत्तर दिशा की ओर प्रभाव के परिणाम स्वरुप यह प्लेट अपने से अधिक मिसाल प्लेट, यूरेशियन प्लेट से टकराई।

इस टकराव के कारण इन दोनों प्लेटों के बीच स्थित ‘टेथिस’ भू अभिनति के अवसादी चट्टान, वलित होकर हिमालय तथा पश्चिम एशिया की पर्वती श्रृंखला के रूप में विकसित हो गए।’टेथिस’के हिमालय के रूप में ऊपर उठने तथा प्रायद्वीपीय पठार के उत्तरी किनारों के नीचे 10 वीं के परिणाम स्वरुप एक बहुत बड़ी द्रोणी का निर्माण हुआ समय के साथ-साथ यह बेसिन उत्तर के पर्वतों एवं दक्षिण की प्रायद्वीपीय पहाड़ों से बहने वाली नदियों के अवसादी नीचे द्वारा धीरे-धीरे भर गया इस प्रकार जल और पीछे से निर्मित एक विस्तृत संदर्भ भाग भारत के उत्तरी मैदान के रूप में विकसित हो गया।

भारत में भौतिक विभिन्नताये :-

भारत की भूमि बहुत अधिक भौतिक विभिन्नताओं को दर्शाती है भूगर्भीय तौर पर प्रायद्वीपीय पठार पृथ्वी की सतह का प्राचीनतम भाग है इससे भूमिका एक बहुत ही स्थिर भाग माना जाता था परंतु हाल के भूकंप आने से गलत साबित किया है हिमालय एवं उत्तरी मैदान हाल में बनी इस कलाकृतियां हैं भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय पर्वत एक स्थिर भाग हिमालय की पूरी पर्वत श्रृंखला एक युवा स्थल आकृतियों को दर्शाती है जिसमें ऊंचे शिखर गहरी घाटियां तथा तेज बहने वाली नदियां हैं उत्तरी मैदानों से बने हैं तथा रूपांतरित ऊंचाई पहाड़ियों एवं चौड़ाई घाटियों से बना है।

मुख्य भौगोलिक वितरण :-

भारत की भौगोलिक आकृतियों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।

हिमालय पर्वत :-

भारत के उत्तरी सीमा पर विस्तृत हिमालय भूगर्भीय रूप से युवा एवं बनावट के दृष्टिकोण से वलित पर्वत श्रृंखला है।यह पर्वत श्रृंखलाएं पश्चिम पूर्व दिशा में सिंधु से लेकर ब्रह्मपुत्र तक फैली है हिमालय विश्व की सबसे ऊंची पर्वत श्रेणी है और एक अत्यधिक असम अवरोधों में से एक है। यह 24 किलोमीटर की लंबाई में फैलेएक अर्धवृत्त का निर्माण करते हैं इसकी चौड़ाई कश्मीर में 400 किलोमीटर एवं अरुणाचल प्रदेश में 150 किलोमीटर है। पश्चिम भाग की अपेक्षा पूर्वी भाग की ऊंचाई में अधिक विविधता पाई जाती है।अपने पूरे देशांतरीय विस्तार की के साथ हिमालय को तीन भागों में बांट सकते हैं।

इन श्रृंखलाओं के बीच बहुत अधिक संख्या में घटिया पाई जाती हैं सबसे उत्तरी भाग में स्थित श्रृंखला को महान आंतरिक हिमालया हिमाद्रि कहते हैं यह सबसे अधिक शतक श्रृंखला है जिसमें 6000 मीटर की औसत ऊंचाई वाले सर्वाधिक ऊंचे शिखर हैं इस में हिमालय की सभी मुख्य शिखर हैं।महान हिमालय के बल्ले की प्रकृति एवं मित्र हिमालय के किस भाग का क्रोड ग्रेनाइट से बना है। यह श्रृंखला हमेशा बर्फ से ढकी रहती है तथा इससे बहुत सी हिमानियां का प्रवाह होता है।

हिमाद्री के दक्षिण में स्थित श्रृंखला सबसे अधिक असम है एवं हिमाचल या निम्न हिमालय के नाम से जानी जाती है इन श्रृंखलाओं का निर्माण मुख्यता अत्याधिक संपीड़ित तथा परिवर्तित सालों से हुआ है। इनकी ऊंचाई 3700 मीटर से 4500 मीटर के बीच तथा औसत चौड़ाई 50 किलोमीटर है जबकि पीर पंजाल श्रृंखला सबसे लंबी तथा सबसे महत्वपूर्ण श्रृंखला है। धौलाधार इन महाभारत श्रृंखलाएं भी महत्वपूर्ण है।

इसी श्रृंखला में कश्मीर की घाटी तथा हिमाचल के कांगड़ा एवं कुल्लू की गाड़ियां स्थित है इस क्षेत्र को पहाड़ी नगरों के लिए जाना जाता है।हिमालय की सबसे बड़ी श्रृंखला को शिवालिका जाता है। इसकी चौड़ाई 10 से 50 किलो मीटर तथा ऊंचाई 900 से 1100 मीटर के बीच है यह श्रृंखलाएं उत्तर में स्थित मुख्य हिमालय की श्रृंखलाओं से नदियों द्वारा लाई गई असम पीड़ित और साधु से बनी है।

यह घटिया बजरी तथा जल और की मोटी परत से ढकी हुई है ईमान चलता था शिवालिक के बीच में स्थित लंब घाटी को उनके नाम से जाना जाता है। कुछ प्रसिद्ध दून हैं – देहरादून, कोटलीदून एवं पाटलीदून। इस उत्तर दक्षिण के अतिरिक्त हिमालय को पश्चिम से पूर्व तक स्थित क्षेत्रों के आधार पर विभाजित किया गया है। इन वर्गीकरण को नदी घाटियों की सीमाओं के आधार पर किया गया है। उदाहरण के लिए सतलुज एवं सिंधु के बीच स्थित हिमालय के भाग को पंजाब हिमालय के नाम से जाना जाता है।

लेकिन पश्चिम से पूर्व तक क्रम सही से कश्मीर तथा हिमांचल हिमालय के नाम से भी जाना जाता है शत्रु सहकारी नदियों के बीच स्थित हिमालय के भाग को कुमाऊं हिमालय के नाम से भी जाना जाता है। काली तथा तीस्ता नदी नेपाल हिमालय का एवं दिव्यांग नदियां असम हिमालय का सीमांकन करते हैं। ब्रह्मपुत्र हिमालय की सबसे पूर्वी सीमा बनाती है।

देहांग महाखड्ड (गार्ज) के बाद हिमालय दक्षिण की ओर एक तीखा मोड़ बनाते हुए भारत की पूर्वी सीमा के साथ फैल जाता है इन्हें पूर्वांचल या पूर्वी पहाड़ियों तथा पर्वत श्रृंखलाओं के नाम से जाना जाता है। यह पहाड़ियां उत्तर पूर्वी राज्यों से होकर गुजरती है तथा मजबूत बलुआ पत्थरों जो अवसादी शैल हैं से बनी है। यह घने जंगलों से ढकी है तथा अधिकतर समानांतर श्रृंखला एवं घाटियों के रूप में फैली हैं उनमें पटकाई, आगामी तथा मणिपुर पहाड़ियां शामिल है।

उत्तरी मैदान :-

उत्तरी मैदान तीन प्रमुख नदी प्रणालियों सिंधु, गंगा एवं ब्रह्मपुत्र तथा उनकी सहायक नदियों से बना है। यह मैदान जलोढ़ मृदा से बना है। लाखों वर्षों में हिमालय गिरी बाद में स्थित बहुत बड़े बेसिन (द्रोणी) मेजर लोगों का निक्षेप हुआ, जिससे इस उपजाऊ मैदान का निर्माण हुआ है। इसका विस्तार 700000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र पर है।यह मैदान लगभग 24 किलोमीटर लंबा एवं 240 से 320 किलोमीटर चौड़ा है। यह सघन जनसंख्या वाला भौगोलिक क्षेत्र है। समृद्ध मृदा आवरण, पर्याप्त पानी की उपलब्धता एवं अनुकूल जलवायु के कारण कृषि की दृष्टि से यह भारत का अधिक उत्पादक क्षेत्र है। उत्तरी पर्वतों से आने वाली नदियां कार्य में लगी है।

नदी के निचले भाग में डाल कम होने के कारण नदी की गति कम हो जाती है जिसके परिणाम स्वरूप नदी है दीपों का निर्माण होता है यह नदियां अपने निचले भाग में गार्ड एकत्र हो जाने के कारण बहुत सी धारा में बैठ जाती है इन धाराओं को वितरिकाएं कहा जाता है।उत्तरी मैदान को मोटे तौर पर तीनों वर्गों में विभाजित किया गया है। उत्तरी मैदान के पश्चिम भाग को पंजाब का मैदान कहा जाता है। सिंधु तथा इसकी सहायक नदियों के द्वारा बनाए गए इस मैदान का बहुत बड़ा भाग पाकिस्तान में स्थित है। सिंधु तथा इसकी सहायक नदियां झेलम, चेनाब, रावी, व्यास तथा सतलुज हिमालय से निकलती है।

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मैदान के इस भाग में दोआबों की संख्या बहुत अधिक है। गंगा के मैदान का विस्तार घघ्घर तथा तीस्ता नदियों के बीच है। उत्तरी बाकी राज्यों हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड के कुछ भाग का पश्चिम बंगाल में फैला हुआ है। ब्रह्मपुत्र का मैदान इसके पश्चिम विशेष असम में स्थित है। उत्तरी मैदानों की व्याख्या सामान्यतः इसके उच्चावचों मैं बिना किसी निवेदिता वाले समतल स्थल के रूप में की जाती है। यह सही नहीं है। इन विस्तृत मैदानों की भौगोलिक आकृतियों में भी विविधता है।

आकृतिक भिन्नता के आधार पर उत्तरी मैदानों को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है।नदियों पर्वतों से नीचे उतरते समय से वाले की डाल पर 8 से 16 किलोमीटर के चौड़ी पट्टी में गुटका का निक्षेपण करती हैं। इसे भाबर के नाम से जाना जाता है। सभी सरिताएं इस भाबर पट्टी में विलुप्त हो जाती हैं। इस पट्टी के दक्षिण में यह सरिता एवं नदियां पुनः निकल आती हैं। एवं नाम तथा दलदली क्षेत्र का निर्माण करती हैं जिसे ‘तराई’ कहा जाता है।

यह वन्य प्राणियों से भरा घने जंगलों का क्षेत्र था। बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को कृषि योग्य भूमि उपलब्ध कराने के लिए इस जंगल को काटा जा चुका है। उत्तरी मैदान का सबसे विशालतम बाग पुराने जलोढ़ का बना है। यह नदियों की बाढ़ वाले मैदान के ऊपर स्थित है तथा वेदिका जैसी आकृति प्रदर्शन करते हैं इस बात को भांगर के नाम से जाना जाता है इस क्षेत्र की मृदा में चुने दार नीचे पाए जाते हैं जिसे स्थानीय भाषा में कंकड़ कहा जाता है।

बाढ़ वाले मैदानों के नए तथा युवा नीचे वाले को खादर कहा जाता है इनका लगभग प्रत्येक वर्ष पुनर्निर्माण होता है इसलिए यह उपजाऊ होते हैं तथा गहन खेती के लिए आदर्श होते हैं। भारत का प्रदीपीय पठार :- प्रदीपीय पठार एक मेज की आकृति वाला स्थल है जो पुराने क्रिस्टली, आग्नेय तथा रूपांतरित सालों से बना है। यह गोंडवाना भूमि के टूटने एवं अफवाह के कारण बना था तथा यही कारण है कि यह प्राचीनतम भूभाग का एक हिस्सा है। इस पठारी भाग में चोरी तथा दूसरी पार्टियों एवं गोलाकार पहाड़ियां है।

इस पठार के 2 मुख्य भाग हैं ‘ मध्य उच्च भूमि ‘ तथा ‘ दक्कन का पठार ‘। नर्मदा नदी के उत्तर में प्रदीप पठार का वह भाग जो कि मालवा के पठार अधिकतर भागों पर फैला है। उसे मध्य उच्च भूमि के नाम से जाना जाता है। विंध्य श्रृंखला दक्षिण में मध्य उच्च भूमि तथा उत्तर पश्चिम में अरावली से गिरी है। पश्चिम में यह धीरे-धीरे राजस्थान के बल हुई तथा पथरीला मरुस्थल से मिल जाता है। इस चित्र में बहने वाली नदियां चंबल, सिंध, बेतवा, केन दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की तरह बहती हैं, इस प्रकार में इस क्षेत्र के डाल को दर्शाती है।

मध्य उच्च भूमि पश्चिम में चोरी लेकिन पूर्व में संकीर्ण है।इस पठार के पूर्वी विस्तार को स्थानीय रूप से बुंदेलखंड तथा बघेलखंड के नाम से जाना जाता है। इसके और पूर्व के विस्तार को दामोदर नदी द्वारा प्रवाहित छोटा नागपुर पठार दर्शाता है।बजट का पठार एक त्रिभुजाकार भूभाग है, जो नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित है उत्तर में इसके चौड़े आधार पर सतपुड़ा की श्रृंखला है जबकि महादेव, कैमूर की पहाड़ी तथा में काल श्रृंखला इसके पूर्वी विस्तार है।

दक्षिण का पठार पश्चिम में ऊंचा एवं पूर्व की ओर कम दाल वाला है। इस पठार का एक भाग उत्तर पूर्व में भी देखा जाता है, जिसे स्थानीय रूप से ‘ मेघालय ‘, ‘कार्बी आंगलोंग पठार’ तथा ‘उत्तर काचार पहाड़ी’ के नाम से भी जाना जाता है। यह एक भ्रंश के द्वारा छोटा नागपुर पठार से अलग हो गया है। पश्चिम से पूर्व की ओर तीन महत्वपूर्ण श्रृंखलाएं गारो खासी तथा जयंतियां हैं। दक्षिण के पठार के पूर्वी एवं पश्चिमी सिरे पर क्रम से पूर्वी तथा पश्चिमी घाट स्थित है।

पश्चिमी घाट, पश्चिमी तट के समानांतर स्थित है। यह सतत है तथा उन्हें केवल दरों के द्वारा ही पार किया जा सकता है। पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट की अपेक्षा ऊंचे हैं। पूर्वी घाट के 600 मीटर की औसत ऊंचाई की तुलना में पश्चिमी घाट की ऊंचाई 900 से 1600 मीटर है। पूर्वी घाट का विस्तार महानदी घाटी से दक्षिण में नीलगिरी तक है। पूर्वी घाट का विस्तार सतत नहीं है।यह नियमित है एवं बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियों से इनको काट दिया है। पश्चिमी घाट में पर्वतीय वर्षा होती है।

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यह वर्षा घाट के पश्चिमी घाट पर आद्र हवा के टकराकर ऊपर उठने के कारण होती हैं।पश्चिमी घाट को विभिन्न स्थानीय नामों से जाना जाता है पश्चिमी घाट की ऊंचाई उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती जाती है। इस बार के शिखर उठे हैं जैसे – अनाईमुडी 2695 मीटर तथा डोडा बेटा 2633 मीटर है। पूर्वी घाट का सबसे ऊंचा शिखर महेंद्र गिरी 1500 मीटर है। पूर्वी घाट के दक्षिण पश्चिम में सेव राय तथा जावेद की पहाड़ियां स्थित है। उडद मंगलम, जिसे उल्टी के नाम से जाना जाता है प्रदीप पठार की विशेषताएं यहां पाई जाने वाली काली मिट्टी है जिसे ‘दक्कन ट्रैप’ के नाम से भी जाना जाता है।

इसकी उत्पत्ति ज्वालामुखी से हुई है इसलिए इसके से लगने हैं वास्तव में शैलों का समय के साथ अपरदन हुआ है जिनसे काली मृदा का निर्माण हुआ है अरावली की पहाड़ियां प्रायद्वीपीय पठार के पश्चिमी एवं उत्तर पश्चिमी किनारे पर स्थित है यह बहुत अधिक अपरदित एवं खंडित पहाड़ियां हैं। यह गुजरात से लेकर दिल्ली तक दक्षिण पश्चिम उत्तर पूर्व दिशा में फैली है।

भारतीय मरुस्थल :-

अरावली पहाड़ी के पश्चिमी किनारे पर थार का मरुस्थल स्थित है यह बालों के डिब्बों से ढाका एक तरंग गीत मैदान क्षेत्र में प्रतिवर्ष 150 मिली मीटर से भी कम वर्षा होती है इस शुष्क जलवायु वाले क्षेत्र में वनस्पति बहुत कम है वर्षा ऋतु में ही कुछ सरिता है दिखती हैं और उसके बाद में बालों में ही विलीन हो जाती हैं पर्याप्त जल नहीं मिलने से वे समुद्र तक नहीं पहुंच पाती हैं केवल लोनी ही इस क्षेत्र की सबसे बड़ी नदी है। बरकान (अर्धचंद्राकार बालू का टीला) का विस्तार बहुत अधिक क्षेत्र पर होता है। लेकिन लंबवत पीले भारत-पाकिस्तान सीमा के समीप प्रमुखता से पाए जाते हैं।

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भारत का तटीय मैदान :-

प्रदीप पठार के किनारों संकीर्ण तटीय पट्टिका का विस्तार है। यह पश्चिमी अरब सागर से लेकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक विस्तृत है। पश्चिमी तट पश्चिमी घाट तथा अरब सागर के बीच स्थित एक संकीर्ण मैदान है। इस मैदान के तीन भाग हैं।तट के उत्तरी भाग को कोंकण (मुंबई तथा गोवा) मध्यमा को कन्नड़ मैदान एवं दक्षिणी व को मालाबार तट कहा जाता है।

बंगाल की खाड़ी के साथ विस्तृत मैदान चौड़ा एवं समतल है। उत्तरी भाग में से उत्तरी सरकार का जाता है।बड़ी नदियां जैसे महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी स्तर पर विशाल डेल्टा का निर्माण करती हैं चिल्का झील पूर्वी तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण भू लक्षण है।

भारत का द्वीप समूह :-

आप पहले ही देख चुके हैं कि भारत का मुख्य स्थल भाग अत्यधिक मिसाल है इसके अतिरिक्त भारत में 2 दीपों का समूह में स्थित है क्या आप इन दीप समूह को पहचान सकते हैं।दीपों का यह समूह छोटे प्रवाल दीपों से बना है पहले इनको लकादीव, मिनीकाय तथा एमीनदीव के नाम से जाना जाता है। 1973 में इनका नाम ‘ लक्षदीप ‘रखा गया। यह 32 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। कवरत्ती द्वीप लक्ष्यदीप का प्रशासनिक मुख्यालय है। इस दीप समूह पर पादप तथा जंतु के बहुत से प्रकार पाए जाते हैं।

पिटली द्वीप, जहां मनुष्य का निवास नहीं है, वहां एक पक्षी अभ्यारण है। अंडमान एवं निकोबार द्वीप हैं। यह द्वीप समूह गान में बड़ी संख्या में बहुल तथा बिखरे हुए हैं। यह द्वीप समूह मुख्यता दो भागों में बांटा गया है उत्तर में अंडमान तथा दक्षिण में निकोबार। यह माना जाता है कि यह द्वीप समूह निमज्जित पर्वत श्रेणियों के शिखर हैं। यह द्वीप समूह देश की सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

हिंदू समूहों में पाए जाने वाले पादप एवं जंतुओं में बहुत अधिक विविधता है। यह द्वीप विषुवत वृत्त के समीप स्थित है एवं यहां की जलवायु विषुवतीय है तथा ‍यहां घने जंगलों से आच्छादित है।विभिन्न भू आकृतिक विभागों का विस्तृत विवरण प्रत्येक विभाग की विशेषताएं स्पष्ट करता है, परंतु यह स्पष्ट है कि यह विभाग एक दूसरे के पूरक हैं और वे देश को प्राकृतिक संसाधनों में समृद्ध बनाते हैं।

उत्तरी पर्वत जल एवं वनों के प्रमुख स्रोत हैं। उत्तरी मैदान देश के अन्न भंडार हैं। इनसे प्राचीन सभ्यताओं के विकास को आधार मिला। पठारी भाग खनिजों के भंडार हैं, जिसने देश के औद्योगिक करण में विशेष भूमिका निभाई है। तटीय क्षेत्र मत्स्यन अर्पित संबंधित क्रियाकलापों के लिए उपयुक्त स्थान है।इस प्रकार देश की विविध भौतिक आकृतियां भविष्य में विकास की ओर अनेक संभावनाएं प्रदान करती हैं।

इस वीडियो के माध्यम से आप और अच्छे से समझ सकते हैं। वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

https://youtu.be/-dijykyBsPw

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