भारत में अपवाह तंत्र

अपवाह शब्द क्षेत्र के नदी तंत्र की व्याख्या करता है। भारत के भौतिक मानचित्र को देखिए। और अपवाह को समझिए। आप पाएंगे कि भारत में विभिन्न दिशाओं से छोटी-छोटी धाराएं आकर एक साथ मिल जाती है तथा एक मुख्य नदी का निर्माण करती है, अंतत है इसका निकास किसी बड़े जलाशय जैसे जी ने समुद्री या महासागर में होता है। एक नदी तंत्र द्वारा जिस क्षेत्र का जल प्रवाहित होता है उसे एक अपवाद द्रोणी कहते हैं।

मानचित्र का अवलोकन करने पर यह पता चलता है कि कोई भी क्षेत्र, जैसे – पर्वत या उच्च भूमि तो पड़ोसियों को एक दूसरे से अलग करती है। इस प्रकार उच्च भूमि को जल विभाजक कहते हैं।भारत के अपवाह तंत्र का नियंत्रण मुख्यता भौगोलिक आकृतियों द्वारा होता है। इस आधार पर भारतीय नदियों को दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया गया है।

• हिमालय की नदियां तथा

• प्रायदीपीय नदियां

गार्ज

भारत के 2 मुख्य भौगोलिक क्षेत्रों से उत्पन्न होने के कारण भिमाला तथा अपराधी पिया नदियां एक दूसरे से भिन्न है। हिमालय के अधिकतर नदिया में बारहमासी नदियां होती है इनमें वर्ष भर पानी रहता है, क्योंकि इन्हें वर्षा के अतिरिक्त ऊंचे पर्वतों से पिघलने वाले हीन धारा भी जल प्राप्त होता है। हिमालय की दो मुख्य नदियां सिंधु तथा ब्रह्मपुत्र इस पर्वतीय श्रृंखला के उत्तरी भाग से निकलती हैं। नदियों ने पर्वतों को काटकर गार्जों का निर्माण किया है।

हिमालय की नदियां अपने उत्पत्ति के स्थान से लेकर समुद्र तक तेल लंबे रास्ते को तय करती हैं यह अपने मार्ग के ऊपरी भागों में तीव्र प्रतिक्रिया करती है तथा अपने साथ भारी मात्रा में सिल्ट एवं बालों का संवहन करती हैं मध्य एवं निचले भागों में यह नदियां विसर्प, गोखुर झील तथा अपने बाढ वाले मैदानों में बहुत सी अन्य नीचे पर आकृतियों का निर्माण करती है। यह पूर्ण विकसित डेल्टाओं का भी निर्माण करती है।

अधिकतर प्रायद्वीपीय नदियां मौसमी होती है, क्योंकि उनका प्रवाह वर्षा पर निर्भर करता है शुष्क मौसम मैं बड़ी नदियों का जल भी घटकर छोटी-छोटी धाराओं में बहने लगता है। हिमालय की नदियों की तुलना में प्रायद्वीपीय नदियों की लंबाई कम तथा चीचली हैं फिर भी इनमें से कुछ केंद्रीय उच्च भूमि से निकलती है तथा पश्चिम की तरह बहती है क्या आप इस प्रकार की दो बड़ी नदियों को पहचान सकते हैं? प्रदीपीय भारत के अधिकतर नदियां पश्चिमी घाट से निकलती है तथा बंगाल की खाड़ी की तरह बहती हैं।

भारत में अपवाह प्रतिरूप :-

एक अपवाह प्रतिरूप में धारा एक निश्चित प्रतिरूप का निर्माण करती हैं जो कि उस क्षेत्र की भूमि की डाल जलवायु संबंधी अवस्थाओं तथा अध:स्थ शैल संरचना पर आधारित है। यह दुमाकृतिक जालीनुमा आयताकार तथा अरीय अपवाह प्रतिरूप है। दुमाकृतिक प्रतिरूप तब बनता है जब धाराएं उस स्थान से बुआ स्थल की ढाल के अनुसार बहते हैं।

इस प्रतिरूप में मुख्यधारा तथा उसकी सहायक नदियां एक वृक्ष की शाखाएं की भांति प्रतीत होती हैं। जब सहायक नदियां मुख्य नदी से समकोण पर मिलती हैं तब जालीनुमा प्रतिरूप का निर्माण करती हैं जालीनुमा प्रतिरूप वहां विकसित करता है जहां कठोर और मुलायम चट्टाने समानांतर पायीं जाती हैं। आयताकार अपवाह प्रतिरूप प्रबंधित शैलीय भूभाग पर विकसित करता है।

नदी की विभिन्न अवस्थाएं

अरीय प्रतिरूप तब विकसित होता है जब केंद्रीय से खरिया गुंबद जैसी संरचना धाराएं विभिन्न दिशाओं में प्रवाहित होती हैं विभिन्न प्रकार के अपवाह प्रतिरूप का संयोजन एक ही अपवाह द्रोणी में ही पाया जा सकता है।

हिमालय की नदियां :-

सिंधु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र हिमालय से निकलने वाली प्रमुख नदियां हैं। यह नदियां लंबी है तथा अनेक महत्वपूर्ण एवं बड़ी सहायक नदियां आकर मिलती हैं। किसी नदी तथा उसकी सहायक नदियों को नदी तंत्र कहा जाता है।

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सिंधु नदी तंत्र :-

सिंधु नदी का उद्गम मानसरोवर झील के निकट तिब्बत में है। पश्चिम की ओर बहती हुई है नदी भारत में जम्मू कश्मीर के लद्दाख जिले से प्रवेश करती है। इस भाग में यह एक बहुत ही सुंदर दर्शनीय गार्ज का निर्माण करती है इस क्षेत्र में बहुत सहायक नदियां जैसे – जास्कर, नूबरा, श्योक तथा हुंजा इन नदी में मिलती है। सिंधु नदी बलूचिस्तान तथा गिलगित से बहते हुए अटक में पर्वतीय क्षेत्र से बाहर निकलती है।

सतलुज, व्यास, रावी चेनाब तथा जेलम आपस में मिलकर पाकिस्तान में मिठानकोट के पास सिंधु नदी में मिलकर जाती हैं। इसके बाद यह नदी दक्षिण की तरफ बहती है तथा अंत में कराची से पूर्व की ओर अरब सागर में मिल जाती है सिंधु नदी के मैदान का ढाल बहुत धीमा है।

सिंधु दुर्ग का एक तिहाई से कुछ अधिक भाग भारत के जम्मू – कश्मीर, हिमाचल तथा पंजाब में तथा पाकिस्तान में स्थित है। 2900 किलोमीटर लंबी सिंधु नदी विश्व की लंबी नदियों में से एक है।

गंगा नदी तंत्र :-

गंगा की मुख्यधारा ‘ भागीरथी ‘ गंगोत्री हिमानी से निकलती है। तथा अलकनंदा उत्तराखंड के देवप्रयाग में किस से मिलती है। हरिद्वार के पास गंगा पार्वती भाग को छोड़कर मैदानी भाग में प्रवेश करती है। हिमालय से निकलने वाली बहुत सी नदियां आकर गंगा में मिलती हैं, इनमें से कुछ प्रमुख नदियां हैं। यमुना, घाघरा, गंडक तथा कोसी।

यमुना नदी हिमालय के यमुनोत्री हिमानी से निकलती है या गंगा के दाहिने किनारे के समानांतर बहती है तथा इलाहाबाद में गंगा में मिल जाती है घाघरा, गंडक तथा कोसी नेपाल हिमालय से निकलती है। Lइसके कारण प्रत्येक वर्ष उत्तरी मैदान के कुछ हिस्से में बाढ़ आती है, जिससे बड़े पैमाने पर जानमाल का नुकसान होता है लेकिन यह वह नदियां है, जो मिट्टी का उपजाऊपन प्रदान कर कृषि योग्य भूमि बना देती हैं। प्रदीप उच्च भूमि से आने वाली मुख्य सहायक नदियां चंबल, बेतवा तथा सोन है।

देवप्रयाग में भागीरथी एवं अलकनंदा का संगम

यह अर्ध शुष्क क्षेत्रों से निकलती हैं इनकी लंबाई कम तथा इनमें पानी की मात्रा भी कम होती है। बाये से दाहिने किनारे की सहायक नदियों के जल से परिपूर्ण होकर गंगा पूर्व दिशा में, पश्चिम बंगाल के फरक्का तक बहती है। यह गंगा डेल्टा का सबसे ऊपर ही बिंदु है।यह नदी दो भागों में बांट जाती है, भागीरथी हुगली (जो इसकी वितरिका है), दक्षिण की तरफ बहती है तथा डेल्टा के मैदान से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।

मुख्यधारा दक्षिण की ओर बहती हुई बांग्लादेश में प्रवेश करती है एवं ब्रह्मपुत्र नदी इससे आकर मिल जाती है। अंतिम चरण में गंगा और ब्रह्मपुत्र समुद्र में विलीन होने से पहले मेघना के नाम से जानी जाती है। गंगा एवं ब्रह्मपुत्र के जलवा लिए वृहद नदी बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। नदियों के द्वारा बनाए गए डेल्टा को सुंदरवन डेल्टा के नाम से जाना जाता है। गंगा की लंबाई 2500 किलोमीटर से अधिक है अंबाला नगर, सिंधु तथा गंगा नदी तंत्रों के बीच जल विभाजक स्थित है।

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अंबाला से सुंदरवन तक मैदान की लंबाई लगभग 1800 किलोमीटर है, परंतु इसके ढाल में गिरावट मुश्किल से 300 मीटर है। दूसरे शब्दों में प्रति 6 किलोमीटर की दूरी पर ढाल में गिरावट केवल 1 मीटर है। इसलिए इन नदियों में अनेक बड़े-बड़े विसर्प बन जाते हैं।

ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र :-

ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत के मानसरोवर झील के पूर्व तथा हिंदू एवं सतलुज के स्रोतों के काफी नजदीक से निकलती हैं। इसकी लंबाई सिंधु से कुछ अधिक है, परंतु इसका अधिकतर मार्ग भारत से बाहर स्थित है। यह हिमालय की समानांतर पूर्व की ओर बहती है। नामचा बरवा शिखर 7757 मीटर के पास पहुंचकर यह अंग्रेजी के यू U अच्छा जैसे मोड़ बनाकर भारत के अरुणाचल प्रदेश में गार्ज के माध्यम से प्रवेश करती है। यहां इसे देहांग के नाम से जाना जाता है तथा दिबांग, लोहित, केनोला एवं दूसरी सहायक नदियां इससे मिलकर असम में ब्रह्मपुत्र का निर्माण करती है। तिब्बत में एक सीट एवं शुष्क क्षेत्र है अतः यहां इस नदी में जल एवं सिल्ट की मात्रा बहुत कम होती है।

भारत में उच्च वर्षा वाले क्षेत्र से होकर गुजरती है। यहां नदी में जल एवं सिल्ट की मात्रा बहुत बढ़ जाती है असम में ब्रह्मपुत्र अनेक धाराओं में बहकर एक गुम्फित नदी के रूप में बहती है तथा बहुत से नदीय द्वीपों का निर्माण करती है। प्रत्येक वर्ष वर्षा में यह नदी अपने किनारों से ऊपर बहने लगती है एवं वार्ड के द्वारा असम तथा बांग्लादेश में बहुत अधिक क्षति पहुंचाती है।

उत्तर भारत के अन्य नदियों के विपरीत ब्रह्मपुत्र नदी में पुल के नीचे पर की मात्रा बहुत अधिक होती है इसके कारण नदी की सतह बढ़ जाती है और यह बार-बार अपनी धारा के मार्ग में परिवर्तन लाती है।

प्रायदीपीय नदियां :-

प्रायदीपीय भारत में मुख्य जल विभाजक का निर्माण पश्चिम घाट द्वारा होता है, जो पश्चिमी तट के निकट उत्तर से दक्षिण की ओर स्थित है। प्रदीपीय भाग की अधिकतर मुख्य नदियां जैसे- महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी पूर्व की ओर बहती हैं। तथा बंगाल की खाड़ी में गिरती है यह नदियां अपने मुहाने पर डेल्टा का निर्माण करते हैं पश्चिमी घाट से पश्चिम मैं बहने वाले अनेक छोटी धाराएं हैं। नर्मदा एवं तापी, दो ही बड़ी नदियां हैं जो कि पश्चिम की तरह बहती है और ज्वारनदमुख का निर्माण करती है। प्रायदीपीय नदियों की अपवाह द्रोणी या आकार में अपेक्षाकृत छोटी हैं।

नर्मदा द्रोणी :-

नर्मदा का उद्गम मध्यप्रदेश में अमरकंटक पहाड़ी के निकट है यह पश्चिम की ओर एक भ्रंश घाटी में बहती है समुद्र तक पहुंचने के क्रम में यह नदी बहुत से दर्शनीय स्थलों का निर्माण करती है जबलपुर के निकटतम संगमरमर के शैलों में यह नदी गहरे गार्ज से बहती है तथा जहां जहां यह नदी तीव्र ढाल से गिरती है वहां ‘ धुआंधार प्रपात ‘ का निर्माण करती है। नर्मदा की सभी सहायक नदियां बहुत छोटी हैं, इनमें से अधिकतर समकोण पर मुख्य धारा से मिलती हैं। नर्मदा द्रोणी मध्य प्रदेश तथा गुजरात के कुछ भागों में विस्तृत है।

तापी द्रोणी :-

तापी का उदगम मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में सतपुड़ा की श्रृंखलाओं में है। यह भी नर्मदा की समानांतर एक भ्रंश घाटी में बहती है, लेकिन इसकी लंबाई बहुत कम है। इसकी द्रोणी मध्य प्रदेश गुजरात तथा महाराष्ट्र राज्य में है। अरब सागर तथा पश्चिमी घाट के बीच का तटीय मैदान बहुत अधिक संकट है। इसीलिए तटीय नदियों की लंबाई बहुत कम है। पश्चिम की ओर बहने वाली मुख्य नदियां साबरमती, माही, भारत-पूजा तथा पेरियार है।

गोदावरी द्रोणी :-

गोदावरी सबसे बड़ी प्रायद्वीपीय नदी है या महाराष्ट्र के नासिक जिले में पश्चिम घाट की ढालो से निकलती है। इसकी लंबाई लगभग 1500 किलोमीटर है। यह बेकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है प्रायद्वीपीय नदियों में इसका अपवाह तंत्र सबसे बड़ा है। इसकी द्रोणी महाराष्ट्र (नदी द्रोणी का 50% भाग), मध्य प्रदेश ,उड़ीसा तथा आंध्र प्रदेश में स्थित है। गोदावरी में अनेक सहायक नदियां मिलती हैं, जैसे – पूर्णा, वर्धा, प्रान्हिता, मांजरा, वेनगंगा तथा पेनगंगा। इनमें से अंतिम 3 सहायक नदियां बहुत बड़ी हैं। बड़े आकार और विस्तार के कारण इसे ‘ दक्षिण ‘ गंगा के नाम से भी जाना जाता है।

गोदावरी में अनेक सहायक नदियां मिलती हैं, जैसे – पूर्णा, वर्धा, प्रान्हिता, मांजरा, वेनगंगा तथा पेनगंगा। इनमें से अंतिम 3 सहायक नदियां बहुत बड़ी हैं। बड़े आकार और विस्तार के कारण इसे ‘ दक्षिण ‘ गंगा के नाम से भी जाना जाता है।

कृष्णा द्रोणी :-

महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट में महाबलेश्वर के निकट एक स्रोत से निकलकर कृष्णा लगभग 1400 किलोमीटर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। तुंगभद्रा, कोयना, घटप्रभा, मुसी तथा भीमा इसकी कुछ सहायक नदियां हैं। इसकी द्रोणी महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा आंध्रप्रदेश में फैली है।

महानदी द्रोणी :-

महानदी का उद्गम छत्तीसगढ़ के उच्च भूमि से है तथा यह उड़ीसा से बैठे हुए बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इस नदी की लंबाई 860 किलोमीटर है। इसकी अपवाह द्रोणी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड तथा उड़ीसा में स्थित है।

कावेरी द्रोणी :-

कावेरी पश्चिमी घाट की ब्रम्हगिरी श्रृंखला से निकलती है तथा तमिलनाडु में कुडलूर के दक्षिण में बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इसकी लंबाई 760 किलोमीटर है। इसकी प्रमुख सहायक नदियां -अमरावती, भवानी, हेमावती तथा काबिनी। इसकी द्रोणी तमिलनाडु, केरल तथा कर्नाटक में विस्तृत है। हिना बड़ी नदियों के अतिरिक्त कुछ छोटी नदियां हैं, जो कि पूर्व की तरह बहती हैं। दामोदर, ब्रह्मनी, वैतरणी तथा सुवर्ण रेखा कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण है।

झीलें :-

कश्मीर घाटी तथा प्रसिद्ध डल झील, नाव वाले घरों तथा शिकारा सिर तो आप परिचित ही होंगे, जो प्रत्येक वर्ष हजारों पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इसी प्रकार आप अन्य झील वाले स्थानों पर भी गए होंगे तथा वहां नौकायान, तैराकी एवं अन्य जलीय खेलों का आनंद लिया होगा। कल्पना कीजिए कभी अगर कश्मीर, नैनीताल एवं दूसरे पर्यटक स्थलों पर जीने नहीं होती ,तब क्या मैं उतना ही आकर्षित करते जितना कि आज करते हैं?

क्या आप कभी यह जानने की कोशिश की है कि इन पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए किसी स्थान पर झीलों का क्या महत्व है? पृथ्वी की सतह के गणित वाले भागों में जहां जल जमा हो जाता है उसे झील कहते हैं। भारत में भी बहुत से झीलें है। यह एक दूसरे से आकार तथा अन्य लक्षणों में भिन्न है।

अधिकतर जिला स्थाई होती है तथा कुछ में केवल वर्षा ऋतु में ही पानी होता है, जैसे अंतर्देशीय अफवाह वाले अर्ध शुष्क क्षेत्रों की द्रोणी वाली झीलें। यहां कुछ ऐसे झीलें हैं, जिनका निर्माण हिमानी एवं वर्क चादर की क्रियाओं के फल स्वरुप हुआ है। जबकि कुछ अन्य जिलों का निर्माण वायु, नदियों एवं मानवीय क्रियाकलापों के कारण हुआ है। एक विसर्प नदी बाढ़ वाले क्षेत्रों में कटकर गोखुर झील का निर्माण करती है।

स्पिट तथा बार (रोधिका) तटीय क्षेत्रों में लैगून का निर्माण करते हैं, जैसे – चिल्का झील, पुलिकट झील तथा कोलेरू झील। अंतर्देशीय भागोवाली झीले कभी-कभी मौसमी होती है, उदाहरण के लिए राजस्थान की सांभर झील, जो एक लवण जल वाली झील है। इसके जल का उपयोग नमक के निर्माण के लिए किया जाता है। मीठे पानी की अधिकांश जिले हिमालय क्षेत्र में है। यह मुख्यतः हिमानी द्वारा बनी है।

दूसरे शब्दों में यह तब बनी जब हिमानी होने या कोई द्रोणी गहरी बनाई। जो बाद में हिना पिघलने से भर गई, या किसी क्षेत्र में सिलावट और मिट्टी से हिमानी मार्ग बधं गए। इसके विपरीत, जम्मू तथा कश्मीर की वूलर झील भूगर्भीय क्रियाओं से बनी है। यह भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी वाली प्राकृतिक झील है। डल झील, भीमताल, नैनीताल, लोकताल तथा बड़ापानी कुछ अन्य महत्वपूर्ण मीठे पानी की झीलें है।

इसके अतिरिक्त, जल विद्युत उत्पादन के लिए नदियों पर बांध बनाने से भी झील का निर्माण हो जाता है, जैसे गुरु गोविंद सागर (भाखड़ा नांगल परियोजना)। झीलें मानव के लिए अत्यधिक लाभदायक होती हैं। एक झील नदी के बहाव को सुचारू रूप बनाने में सहायक होती है। अत्यधिक वर्षा के समय यह बाढ़ को रोकती है तथा सूखे के मौसम में यह पानी के बहाव को संतुलित करने में सहायता करती है।

झीलों का प्रयोग जल विद्युत उत्पन्न करने में भी किया जा सकता है। यह आसपास के क्षेत्रों की जलवायु को सामान्य बनाते हैं, जरिए पारितंत्र को संतुलित रखती है, जिलों की प्राकृतिक सुंदरता व पर्यटक को बढ़ाती है तथा हमें मनोरंजन प्रदान करती हैं।

लोकतक झील

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भारत की नदियों का अर्थव्यवस्था में महत्व :-

संपूर्ण मानव इतिहास में नदियों का अत्यधिक महत्व रहा है। नदियों का जल मूल प्राकृतिक संसाधन तथा अनेक मानवीय क्रियाकलापों के लिए अनिवार्य है। यही कारण है कि नदियों के तट ने प्राचीन काल से ही आदिवासियों को अपनी ओर आकर्षित किया है। यह गांव अब बड़े शहरों में परिवर्तित हो चुके हैं। किंतु भारत जैसे देश के लिए, जहां की अधिकांश जनसंख्या जीविका के लिए कृषि पर निर्भर है, वहां सिंचाई, नौसंचालन, जल विद्युत निर्माण में नदियों का महत्व बहुत अधिक है।

नदी प्रदूषण :-

नदी जल की घरेलू, औद्योगिक तथा कृषि भी बढ़ती मांग के कारण इसकी गुणवत्ता प्रभावित हुई है। इसके परिणाम स्वरूप, नदियों से अधिक जल की निकासी होती है तथा इसका आयतन घटता जाता है। दूसरी ओर, उद्योगों का प्रदूषण तथा ऐप परिष्कृत कचरे नदी में मिलते रहते हैं। यह केवल जल की गुणवत्ता को ही नहीं, बल्कि नदी के सौदा स्वच्छ करण की क्षमता को भी प्रभावित करता है।

उदाहरण के लिए दिए गए समुचित जल प्रवाह में गंगा का जल लगभग 20 किलोमीटर क्षेत्र में फैले बड़े शहरों की गंदगी को तनु करके समाहित कर सकता है लेकिन लगातार बढ़ते हुए उद्योगी करण एवं शहरीकरण के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाता तथा अनेक नदियों में प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है।

नदियों में बढ़ते प्रदूषण के कारण इन को स्वच्छ बनाने के लिए अनेक कार्य योजनाएं लागू की गई हैं। क्या आपने कभी ऐसी कार्य परियोजनाओं के बारे में सुना है? नदी के प्रदूषित जल से हमारा स्वास्थ्य किस प्रकार प्रभावित होता है? बिना स्वच्छ जल का मानव जीवन हो ही नहीं सकता है। शहरीकरण से ही नदी प्रदूषण प्रभावित हो रही है।

उदाहरण के लिए दिए गए समुचित जल प्रवाह में गंगा का जल लगभग 20 किलोमीटर क्षेत्र में फैले बड़े शहरों की गंदगी को तनु करके समाहित कर सकता है लेकिन लगातार बढ़ते हुए उद्योगी करण एवं शहरीकरण के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाता तथा अनेक नदियों में प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है नदियों में बढ़ते प्रदूषण के कारण इन को स्वच्छ बनाने के लिए अनेक कार्य योजनाएं लागू की गई हैं।

क्या आपने कभी ऐसी कार्य परियोजनाओं के बारे में सुना है? नदी के प्रदूषित जल से हमारा स्वास्थ्य किस प्रकार प्रभावित होता है? बिना स्वच्छ जल का मानव जीवन हो ही नहीं सकता है। शहरीकरण से ही नदी प्रदूषण प्रभावित हो रही है।

राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (National River Conservation Plan) :-

गंगा कार्य परियोजना क्रियाकलापों का पहला चरण 1985 में आरंभ किया गया एवं इसे 31 मार्च 2000 को बंद किया गया था। राष्ट्रीय नदी संरक्षण प्राधिकरण की कार्यकारी समिति ने गंगा कार्य परियोजना के प्रथम चरण की प्रगति की समीक्षा की कार्य परियोजना के प्रथम चरण से प्राप्त अनुभव के आधार पर आवश्यक सुझाव दिए। इस कार्य योजना को देश की प्रमुख प्रदूषित नदियों में राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के अंतर्गत लागू किया गया है।

गंगा कार्य योजना के दूसरे चरण को राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के अंतर्गत शामिल कर लिया गया है। विस्तृत राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना में अब 16 राज्यों की 27 नदियों के किनारे बसे 152 शहर शामिल हैं। इस कार्य योजना के तहत 57 जिलों में प्रदूषण को कम करने के लिए कार्य किया जा रहा है। प्रदूषण को कम करने वाली कुल 215 योजनाओं को स्वीकृति दी गई है।

अभी तक 69 योजनाएं इस कार्य योजना के तहत पूरी हो चुकी हैं। इसके अंतर्गत, लाखों लीडर प्रदूषित जल को रोककर उसकी दिशा में परिवर्तन करके परिष्करण करने का लक्ष्य रखा गया है।

Watch video :-

https://youtu.be/xukALFLUW1A

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