रेलवे का निजीकरण एक गलत निर्णय है। .


रेल में भ्रष्टाचार है जिसे कम करने और रेल को बेहतर बनाने के लिए निजीकरण की आवश्यकता नहीं है। निजीकरण किसी भी तरीके से भ्रष्टाचार के न होने का सूचक नहीं है।
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सरकार और निजी व्ययसाय करने वाले की सोच में मूल अंतर→
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निजी व्ययसायी : अल्पावधि फायदा देखता है (short term benefits), जबकि
सरकार : दूरगामी फायदा देखती है (long term benefits )

उदहारण— अगर सभी विद्यालयों को निजी कर दिया जाये तो सिर्फ अमीरो के बच्चे ही पढ़ पाएंगे, और समय के साथ समाज में अशिक्षा बढ़ेगी। देखते-देखते 4-5 पीढ़ियां निकलने के साथ देश का शिक्षा स्तर गिर जायेगा और समाज में बेरोजगारी, भुखमरी , आत्म-हत्या , अपराध , आदि बढ़ेगा। देश कमजोर हो जायेगा और बाहरी ताकतें हमला करके गरीबों-अमीरों सभी को या तो ख़त्म कर देंगी या गुलाम बना लेंगी।
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क्यूंकि निजीकरण सिर्फ पास का फायदा देखता है, उसे दूरगामी फायदे से ज्यादा मतलब नहीं होता। जबकि सरकार को आज और कल हर दिन को ध्यान में रखना होता है। इसीलिए शिक्षा व्यवस्था हमेशा सरकारी हाथ में होनी चाहिए। इसी तरह से स्वास्थ्य व्यवस्था, बैंक, कृषि, ऊर्जा, पुलिस, आदि सभी क्षेत्र सरकारी निगरानी में होने चाहिए।

रेलवे का सरकारी होना इसीलिए ज़रूरी है। अगर निजी हो गया तो देखते ही देखते ऐसे क्षेत्रो में रेल सेवा बंद हो जाएगी जहां निजी रेल को फायदा कम होगा (या फिर सेवा बहुत कम कर दी जायेगी) .

इससे 2 बड़े नुकसान होंगे:
(1) बहुत से छात्र-छात्राओं की पढाई पर असर पड़ेगा,
(2) व्यापार पर भयंकर असर पड़ेगा जिससे महंगाई बढ़ेगी। मज़दूरों, कामगारों और अन्य छोटे व्यापारिओं जिनकी संख्या करोड़ों में होगी, सिर्फ रेल के माध्यम से ही आज भारत के किसी भी कोने में पहुंच जाते हैं।
दोनों ही वजहें आने वाले समय में देश को पीछे धकेलेगी।

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समाधान:
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एकमात्र तर्क जो रेल के निजीकरण के समर्थन में होता है वह है की इससे रेल में भ्रष्टाचार कम होगा। लेकिन ऐसे लोग कभी प्राइवेट सेक्टर द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार और कर्मचारियों के उत्पीड़न पर नहीं बोलते। विजय माल्या से लेकर नीरव मोदी तक प्राइवेट सेक्टर के भ्रष्टाचार का ही नतीजा हैं।
अगर रेलवे में भ्रष्टाचार कम करना है और इसे मुनाफे में लाना है तो 2 कानून की ज़रुरत होगी :

1) रेल मंत्री का सीधा चुनाव , जिसे जनता किसी भी दिन नौकरी से निकाल सकती है,मतलब #REGO कानून। (और सजा भी देने का अधिकार जनता की जूरी* के पास होगा, न कि जज के पास)

2) सभी रेलवे कर्मचारिओं के खिलाफ शिकायत को सुनने और सजा देने का अधिकार जनता द्वारा बनायीं गयी जूरी* के पास होगा।

रेल में भ्रष्टाचार इसलिए है क्यूंकि इसमें सभी कर्मचारिओं की नौकरी फिक्स है और आम जनता जिसे रेल में सफर करना है वह न किसी सम्बंधित कर्मचारी/अधिकारी /मंत्री को नौकरी से हटा सकती है और न ही सजा दे सकती है। अब अगर 20% सम्बंधित कर्मचारी/अधिकारी बेईमान और निकम्मे होते हैं तो उनकी वजह से अन्य भी धीरे-धीरे निकम्मे हो जाते हैं। इस वजह से नौकरी पाने के बाद एक एक कर के ये लोग भ्रष्ट हो जाते हैं और यात्रिओं से बदसुलूकी करते हैं।
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*जूरी कोर्ट के बारे में संक्षिप्त जानकारी:

जूरी कहते हैं वोटर लिस्ट से रैंडम्ली चुने गए नागरिकों को जो दो पक्षों, गवाहों आदि को सुनकर फैसला देते हैं।
मामले की जटिलता एवं आरोपी की हैसियत के अनुसार महा जूरी मंडल तय करेगा कि 15-1500 के बीच में कितने सदस्यों की जूरी बुलाई जानी चाहिए। तब जूरी प्रशासक मतदाता सूची से लॉटरी द्वारा सदस्यों का चयन करते हुए जूरी मंडल का गठन करेगा और मामला इन्हें सौंप देगा।

अब यह जूरी मंडल दोनों पक्षों, गवाहों आदि को सुनकर फैसला देगा। प्रत्येक जूरी सदस्य अपना फैसला बंद लिफ़ाफ़े में लिखकर ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर या जज को देंगे। दो तिहाई सदस्यों द्वारा मंजूर किये गये निर्णय को जूरी का फैसला माना जाएगा। किन्तु मृत्यु दंड में 75% सदस्यों के अनुमोदन की जरूरत होगी। जज या ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर सभी के सामने जूरी का निर्णय सुनायेंगे। यदि जज जूरी द्वारा दिए गए फैसले को खारिज करना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है। प्रत्येक मामले की सुनवाई के लिए अलग से जूरी मंडल होगा, और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाएगी। पक्षकार चाहे तो फैसले की अपील उच्च जूरी मंडल में कर सकते है।

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