The Kashmir files : कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचार की कहानी ,आखिर क्या हुआ था उन पंडितो के साथ1:-

The Kashmir files movie के अंदर विशेष रूप से कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचार की कहानी बताई गई है। इस कहानी में कश्मीर के अंदर से कश्मीरी पंडितों को निकाले जाने की कहानी है, कश्मीरी पंडित जो कि कभी 15-20% कश्मीर के अंदर कश्मीर का हिस्सा हुआ करते थे। उन्हें वहां से निकाल दिया गया।

कश्मीरी

वास्तव में 30 साल बीत चुके हैं, कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को निकाले जाने की। लेकिन अभी तक इसके बारे में कोई भी ऐसा तथ्यात्मक जानकारी नहीं सामने आए हैं जिस जानकारी की वजह से आप और हम इसे किसी ऐतिहासिक पुस्तक में पढ़ सकें या फिर किसी हमारे सिलेबस के किताब में या फिर किसी फिल्मों के माध्यम से समझ सके।

क्योंकि हाल ही में इस फिल्म के माध्यम से इसे दर्शाने का प्रयास किया गया तो लोगों में बहुत सारी तथ्यात्मक जानकारियां प्राप्त करने की जिज्ञासा है। तो आइए इस पूरी जानकारी को समझने का प्रयास करते हैं और आगे समझते हैं।

ग्लोबल वार्मिंग के क्या कारण है?

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क्या है कश्मीर फाइल्स ( Kashmir files) :-

असल में कश्मीर के अंदर 12 जनवरी के दिन को हाईलाइट करके दिखाया गया है। 19 जनवरी 1990 को उस दिन के रूप में याद किया जा रहा है जिस समय पर कश्मीर रूप से कश्मीरी पंडितों को निकलने का फरमान जारी किया गया था। जो कश्मीरी पंडित अपने घर नहीं छोड़ कर भागे उन्हें मार दिया गया था।

असल में इस फिल्म के माध्यम से एक बहुत बड़े विषय को टच किया गया है और टच किया गया विषय यह है कि क्या बहुसंख्यक पर अत्याचार नहीं हो सकते? वास्तव में जब से हमारे देश के अंदर एक विचारधारा पंथनिरपेक्षता (Secularism) ने जन्म लिया है। विशेष रूप से जब से हमारे प्रस्तावना (Preamble) के अंदर पंथनिरपेक्षता शब्द जोड़ा गया है।

तब से यह समझ में आता है कि अल्पसंख्यक (Minority) के हितों का ध्यान रखना ही पंथनिरपेक्ष है। अरे जैसे देश में यहां पर क्षेत्रीय ताकि सांसद क्षेत्र के हिसाब से भी धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक होती हैं जैसे कि कश्मीर के अंदर बहुत सारे बहुसंख्यक मुस्लिम थे। अल्पसंख्यकों में कश्मीरी पंडित थे। यह मान करके कि हिंदू भारत में बहुत संख्या है इसलिए पंथनिरपेक्षता की अवधारणा कश्मीर में Treat नहीं हो पाई।

इस विषय को इस पूरी फिल्म के अंदर जोड़ा गया है। अगर भारत में बहुसंख्यक हिंदू हैं। मौसम के ऊपर अत्याचार नहीं हो सकती यह‌ अध्यक्षता सेट (Preside set) करती हुई यह फिल्म बताती हैं। कि ऐसा नहीं है।

कई बहुसंख्यक हिंदू थे वह जब कश्मीर में बहुसंख्यक थे तो उन पर जितनी प्रताड़ना हुई उस प्रताड़ना ओं की Respect या Reference मैं सरकार के द्वारा उठाए गए जो कदम थे।वह नाकाफी और अपर्याप्त थे। इस विषय को यहां पर हूं बताने का प्रयास किया गया है आइए जानते हैं कि ऐसा क्या हुआ कश्मीर में जिस से कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़कर जाना पड़ा।

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1990 में ही स्थितियां क्यों बिगड़ी?

अब सवाल यह उठता है कि ऐसी स्थिति 1990 मई के बिगड़े स्थितियां अगर बिगड़ नहीं होती तो 1947 में जब भारत के साथ कश्मीर मिला था उसी समय स्थितियां बिगड़ने चाहिए थी या फिर ऐसा मानिए जब पाकिस्तान के द्वारा POK ( Pakistan Occupied Kashmir) ले लिया गया था। उसी समय स्थिति या खराब हो गई होती। पर ऐसा 1990 में ही क्यों हुआ? इसके पीछे बहुत बड़ी Story जो इस फिल्म के माध्यम से बताने का प्रयास किया गया है।

उस समय कश्मीर के लोग एक नारी इस प्रकार देते थे-

जागो जागो सुबह हुई,

रूस ने बाजी हारी है।

हिंद पर लरजन तारे हैं,

अब कश्मीर की बारी है।

अब आजादी हमारी हैं,

हम क्या चाहते हैं आजादी।

आजादी का मतलब ला इलाहा- इल्लाह अगर कश्मीर में रहना है तो अल्लाह हू अकबर कहना होगा।

ऐ जालिमों, ऐ काफिरों,

कश्मीर हमारा है।

यहां क्या चलेगा निजाम-ए- मुस्तफा,

रालिब, ग़ालिब या चालिब

रालिब, ग़ालिब या चालिब का अर्थ है कि या तो इस्लाम कबूल कर लो, या मर जाओ या कश्मीर छोड़कर चले जाओ।यह वह पंक्तियां हैं जिसको कश्मीर में उनके द्वारा गूंजा जाता था। पहले इस बात को समझने का प्रयास कीजिए कि रूस ने बाजी हारी है इसका मतलब क्या है।आइए समझते हैं।

रूस ने बाजी हारी है इसका अर्थ क्या है?

वास्तव में कश्मीरी लोगों को उस समय यह समझाया गया कि आपके ऊपर भारत ने गलत तरीके से कब्जा किया हुआ है। अब जब भारत में आप पर गलत तरीके से कब्जा किया गया है तो भारत कोई इतनी बड़ी शक्ति नहीं है ,जब रूस अफगानिस्तान छोड़ कर हार मान सकता है तो भारत क्यो नही।

रूस का अफगानिस्तान पर कब्जा करने का मकसद :-

कुछ समय पहले की बात है अफगानिस्तान के अंदर रूस कब्जा कर रहा था। अफगानिस्तान में रूस के द्वारा 1980 के दशक में चढ़ाई कर दी गई थी। जैसे इस समय यूक्रेन के अंदर रूस का कब्जा होता जा रहा है। उसी तरह 1980 में भी हुआ था। अमेरिका को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। बिल्कुल वैसे ही समझे कि जिस प्रकार आज अमेरिका को यूक्रेन में आता हुआ रूस बर्दाश्त नहीं कर रहा है।

अमेरिका उन हदों को पार करना चाहता था। जिससे अफगानिस्तान से रूस को भगाया जा सके। इसलिए अमेरिका ने अफगानिस्तान के अंदर एकदम निकृष्ट (अपराधी) किस्म के लोग थे। उन्हें मोटिवेट करना शुरू किया और कहा कि रूस के खिलाफ हो जाओ और रूस को भगाने का प्रयास करो। अफगानिस्तान के अंदर रह रहे लोगों को मुजाहिद्दीन कहा जाने लगा और वह लोग रूस के ऊपर छद्म युद्ध (आक्रमण) करने लगे।

परिणाम यह निकल के आया कि अफगानिस्तान में एक ऐसी यूनिट बनकर तैयार हो गई जिस ने हमला करके रूस को मजबूर कर दिया और Finally रूस को अफगानिस्तान छोड़कर जाना पड़ा। अफगानिस्तान से यह संदेश पाकिस्तान ने लिया कि भारत में रह रहे या कश्मीर में रह रहे मुसलमानों आपको यह समझना होगा, कि जिस प्रकार से अफगानिस्तान से रूस को भगाया जा सकता है वैसे ही कश्मीर से हिंदुओ को भी भगाया जा सकता है अगर कश्मीरी पंडितों को हटाना है तो फिर रालिब, ग़ालिब या चालिब अपनाना होगा। अर्थात इस्लाम कबूल करो,वरना मर जाओ या फिर कश्मीर छोड़कर चले जाओ।

कुछ ऐसी भी दर्दनाक कहानी यहां पर बयान की जाती थी जिन्हें आप सोचेंगे तो सुनकर आपका हृदय छिन्न-भिन्न हो जाएगा।

असि- गछि पाकिस्तान, बटव रोवस्त बटनेवसान अर्थात हमें पाकिस्तान चाहिए, पंडित के बगैर पर उनकी औरतों के साथ। यानी कि इस अत्याचार में जहां पर पुरुष पंडितों की हत्याएं हो रही थी। लेकिन महिलाओं के ऊपर अत्याचार हुए रेप की कोई गिनती ही नहीं थी। उन महिलाओं को जबरदस्ती (जबरन) Convert करवाया जा रहा था या फिर उनके साथ ज्यादतियां की जा रहे थे।

एक अनुमान के मुताबिक लगभग 70000 परिवारों ने कश्मीर छोड़ा था। 19 जनवरी 1990 के दिन सबसे ज्यादा लोगों ने कश्मीर को छोड़ा था। इसलिए इस दिन को सबसे ज्यादा याद किया जाता है। लेकिन 19 जनवरी को ही क्यों इस बारे में आगे जानकारी दी गई है आखिर ऐसी परिस्थितियों क्यो बिगड़ गई थी।

आखिर कश्मीरी लोग इतने कश्मीरी पंडितों के खिलाफ क्यों हो गये। आइए जानते हैं।

19 जनवरी को ही क्यों कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़कर जाना पड़ा?

गुलाम मोहम्मद शाह नामक एक व्यक्ति था उनके बहनोई फारूक अब्दुल्ला उस समय सरकार हुआ करते थे तो गुलाम मोहम्मद शाह ने फारूक अब्दुल्ला से उनके सत्ता छीन ली और 1986 में ही जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री गुलाम मोहम्मद शाह बन गये। अब यह खुद को साबित करने के लिए गुलाम मोहम्मद शाह ने एक खतरनाक निर्णय लिया।

उन्होंने कहा कि जम्मू के जो New civil secaratiate area केंद्रीय पुराना मंदिर है उसे गिरा कर एक भव्य शाही मस्जिद बनवाई जाएगी। इस बात का लोगों ने प्रदर्शन करना शुरू कर दिया लोगों ने कहा कि यह काम सही नहीं होगा। मस्जिद न बनाई जाए।

जवाब में कट्टरपंथियों (गुलाम मोहम्मद शाह के समर्थक) या उस समय के मुसलमान थे। उन्होंने नारा दिया कि इस्लाम खतरे में है, और उसके बाद कश्मीरी पंडितों पर धावा बोल दिया दक्षिणी कश्मीर और सोपोर में सबसे ज्यादा हमले हुए। जोर इस बात पर रहता था कि प्रॉपर्टी को लूट लिया जाए। और रेप तो By product के रूप में किए जाते थे।

अब गुलाम मोहम्मद शाह को राज्यपाल जगमोहन के द्वारा किया गया बर्खास्त :-

नतीजा सामने यह आया कि 12 मार्च 1986 को राज्यपाल जगमोहन ने गुलाम मोहम्मद शाह की सरकार को दंगे न रोक पाने की नाकामी के चलते हुए बर्खास्त कर दिया। इस इस प्रकार से समझिए कि 1986 के अंदर जो सरकार छीन कर बनाई गई थी उसे 1986 में ही पूरी तरह बर्खास्त कर दिया गया।

1987 में फिर चुनाव हुए इस चुनाव में कट्टरपंथी हार गए इसका मतलब था कि चुनाव के अंदर जो अपराधी किस्म के लोग थे जो कश्मीरी पंडितों के खिलाफ बयान बाजी कर रहे थे वास्तव में वह यह चुनाव हार गए। जब यह चुनाव हार गए तो इससे यह संदेश निकल कर आना चाहिए था कि कश्मीरी लोग आपस में मिलकर रहना चाहते हैं।

कश्मीरी पंडित और मुसलमान मिलकर रहना चाहते हैं। इसे आसानी से देखा भी जा सकता था। लेकिन चुनाव में कट्टरपंथियों का हारना एक प्रकार से चुनाव में धांधली की तरफ कट्टरपंथियों ने रुख मोड़ दिया और कहा कि इस्लाम खतरे में है। इसी को ध्यान में रखते हुए 1988 में जम्मू एंड कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (Jammu and Kashmir Liberation Front) बना। जिसे आप (JKLF) के नाम से जानते हैं।

कश्मीर को भारत से अलग रखने के लिए कश्मीरियत अब सिर्फ मुसलमानों के पास रह गई है ऐसा कह करके JKLF का निर्माण हुआ। पंडितों की कश्मीरियत को भुला दिया गया।

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कई सारे लोगों को बेरहमी से मारा गया :-

14 सितंबर 1989 को भाजपा के एक नेता पंडित टीकाराम टपलु की कई लोगों के सामने हत्या कर दी गई। हत्यारे पकड़े नहीं गए। कश्मीरी पंडितों को भगाने के लिए यह पहली हत्या थी। यानी की पहली हत्या 14 सितंबर 1989 में हुई थी। लोगो भगाने के लिए इधर से उधर प्रयास करने लगे। डेढ़ महीने बाद जज नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई। यह नीलकंठ गंजू वो व्यक्ति थे जिन्होंने JKLF के एक नेता मकबूल भट्ट को मौत की सजा सुनाई थी।

इसके बाद ही गंजू की पत्नी का किडनैप कर लिया गया इनकी पत्नी कभी नहीं मिली। वकील प्रेमनाथ भट्ट को भी मार दिया गया। अब 13 फरवरी 1990 को श्रीनगर के टेलीविजन केंद्र के निदेशक लासा कौल की हत्या कर दी गई। आप इस तरह से अंदाजा लगा सकते हैं कि साधारण लोगों की तो इस पूरी कहानी में कहीं कोई गिनती ही नहीं हो रही है

इस प्रकार जुलाई से नवंबर 1989 के बीच में 70 अपराधियों को जेल से रिहा कर दिया गया क्यों रिहा किया गया इस बारे में अभी तक जम्मू एंड कश्मीर की जो National Conference सरकार है वह कोई भी जवाब नहीं दे पाई है।

अखबारों और लाउडस्पीकर के द्वारा कश्मीरी पंडितों को दी गई चेतावनी :-

4 जनवरी 1990 में आफताब नामक उर्दू अखबार में यह न्यूज़ छपवा दी गई थी, चौराहों और मस्जिदों पर लाउडस्पीकर लगाकर कहा गया कि पंडितों यहां से चले जाओ नहीं तो बहुत बुरा होगा। हिज्बुल मुजाहिदीन ने इस न्यूज़ को al-saba नामक अखबार में दोबारा छपवाया। लोग लगातार हत्या एवं रेप करने लगे।

कहते हैं कि पंडितों यहां से भाग जाओ और अपनी औरतों को ही छोड़ जाओ गिरिजा टिक्कू का गैंगरेप हुआ और उन्हें मार दिया गया। ऐसी अनेक घटनाएं हुईं जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं है। किस्सो में रह गया एक आतंकवादी बिट्टा कराटे जिसने 20 लोगों को मारा।

देखे वीडियो:https://youtu.be/94rdgWRMoqsHk

इस वीडियो में बिट्टा कराटे गर्व से कहता हुआ दिखाई पड़ रहा है कि उसने 20 लोगों को मारा। JKLF इन सारी घटनाओं में बहुत आगे था।

हजारों, लाखों परिवारों को कश्मीर छोड़कर जाना पड़ा :-

एक आंकड़ों के मुताबिक लगभग 500000 लोगों ने उस समय कश्मीर को छोड़ा और इन पंडितों के प्रॉपर्टी को हथिया लिया गया। कुछ पंडितों ने वहां रुकने का बहुत प्रयास किया पर उनके साथ भी नरसंहार हुआ। 1997, 1998 और 2003 के दौरान जो बचे हुए लोग थे उन्हें भी मार दिया गया।

आप लोग ही समझने का प्रयास कीजिए यहां पर सरकारों के द्वारा किए गए प्रयासो को जो, या तो सारी घटनाए न काफी सिद्ध हुई बल्कि कई जगहों पर कई चीजों के ऊपर आक्षेप लगे।

कुछ तस्वीरों के माध्यम से उनकी दुर्दशा दिखाना चाहती हूं आप देख सकते हैं कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा जब वह अपना शहर, अपना घर छोड़कर भाग रहे थे।

कश्मीर छोड़ कर जाते हुए कश्मीरी पंडित

आपके सामने बेनजीर भूट्टो का एक बयान, जो कि पाकिस्तान में बैठे-बैठे कश्मीर के लोगों को भड़का रही थी।

Watch video :- https://youtu.be/-vlPG1UjglA

यह कदम बहुत घातक सिद्ध हुए :-

1989 में जब वी. पी. सिंह की सरकार बनी और मुफ्ती मुहम्मद सईद गृहमंत्री बने तो उस समय उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए, जिससे आतंकवादियों के हौसले बढ़ गये।

1.हौसला बढ़ाने वाला कदम मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी रूविया सईद का आतंकवादियों द्वारा किया गया अपहरण का मामला था।रूविया सईद को छुड़वाने के लिए आतंकवादियों की रिहाई की गई। उस वक आतंकवादियों को लगा कि सरकार तो आसानी से झुक सकती है।

2. दूसरा कदम उनके द्वारा उठाया गया है कि श्रीनगर शहर में मौजूद BSF के मौजूद मोर्चेों को हटा दिया गया। इसको हटाने के पीछे यह दलील दी गई कि इनसे लोगों को दिक्कत हो रही है। जिससे सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हुई।

3. तीसरा कदम यह था कि वरार-ए-शरीफ के लिए करीब एक लाख से ज्यादा लोगों के जुलूस को अनुमति दी गई। इससे भी पाकिस्तान के पक्ष में माहौल बन गया।

4. चौथा कदम यह था कि जो लोग आजाद कश्मीर की मांग कर रहे थे। उन लोगों को श्रीनगर स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ के ऑफिस जाने की अनुमति दी गई। इसका असर यह हुआ कि कश्मीर के एक बड़े वर्ग में यह संदेश गया कि भारत कश्मीर को छोड़ रहा है

क्या आज अत्याचार रुक गए हैं? जवाब है नहीं :-

• 2000 में अनंतनाग के पहलगाम के अंदर 30 अमरनाथ यात्रियों की आतंकियों ने हत्या कर दी गई।

• 20 मार्च 2000 विती सिंगपोस नरसंहार, 36 सिखों की गुरुद्वारे के सामने आतंकियों ने गोली मार कर हत्या कर दी, 2001 में डोड़ा में 6 हिंदुओं की आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।

• 2001 जम्मू कश्मीर रेलवे स्टेशन नरसंहार, सेना के भेष में आतंकियों ने रेलवे स्टेशन पर गोलीबारी कर दी, इसमें 11 लोगों की मौत हो गई।

• 2002 में जम्मू के युनाथ मंदिर पर आतंकियों ने दो बार हमला किया, पहला 30 मार्च और दूसरा 24 नवंबर को इन दोनों हमलों में 15 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई।

• 2002 क्यासिम नगर नरसंहार, 29 हिन्दू मजदूरों को मार डाला गया। इनमें 13 महिलाएं और एक बच्चा शामिल

• 2003 नदिमार्ग नरसंहार, पुलवामा जिले के नदिमार्ग गांव के अंदर आतंकियों ने 24 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया था।

2019 में Article 370 भारत सरकार के द्वारा हटाया गया :-

Finally 6 अगस्त 2019 को भारत सरकार के द्वारा जम्मू कश्मीर को दिया गया विशेषाधिकार समाप्त कर दिया गया। और आर्टिकल 370 हटा दिया गया।

इससे निश्चित ही वहां की परिस्थितियों में परिवर्तन आएगा ऐसी उम्मीद की जाती है।

इस फिल्म के डायरेक्टर विवेक रंजन अग्निहोत्री ने बताया कि हाल ही में अमेरिका के अंदर एक रोड स्टेट है जिसमें इस पूरे घटना को एक पक्ष के रूप में विचार करते हुए किया है। यह अपने आप में एक फिल्म का इंपैक्ट के रूप में देखा जा रहा है।

कुछ राज्यों में टैक्स फ्री हुई फिल्म :-

विभिन्न राज्यों जिसमें से हरियाणा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात प्रमुख है। फिल्म की कमाई में 3 दिन में 325% का देखने को मिला है। फिल्म की स्क्रीन्स को भी 600 से बढ़ाकर 2000 कर दिया गया है।राजस्थान के कांग्रेस विधायक भंवरतात शर्मा ने फिल्म द कश्मीर फाइल्स को राज्य में टैक्स फ्री करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह जरूरी है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग कश्मीरी ब्राह्मणों का दर्द देखें।

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