वोट वापसी का अधिकार क्या है और ये कैसे काम करता है –

किसी भी अधिकार को लागू करवाने के लिए कानून बनवाना पड़ता है। और कानून बनाने के लिए किसी भी आदेश को राजपत्र या गेजेट में छापना होता है।

देश वादों, बातों, नारों से नहीं चालया जाता। देश कानून से चलाया जाता है।

मान लीजिए कि अगर किसी राज्य का मंत्री अपने चुनावी भाषण में ये कहता है कि वो गरीबों को पांच पांच लीटर केरोसिन मुफ्त देगा। पर सत्ता में आते ही वो कानून गेजेट मे
छाप कर, जिले के सभी कलेक्टरों को आदेश देता है कि सिर्फ तीन लीटर ही करोसिन मुफ्त दिया जाए तो कलेक्टर को कोई मतलब नहीं कि मंत्री जी ने क्या कहा था अपने चुनावी रैली में, उसे सिर्फ गेजेट नोटिफिकेशन से मतलब है। वो सिर्फ तीन लीटर ही करोसीन देगा वरना अपनी नौकरी खो देगा।

नोट बंदी, लॉकडाउन, धारा 370 हटाना जैसे मुद्दें भी कानून के तौर पी गज्जेट में छापे गए।

तो अगर ये कहें कि मुख्य मंत्री एवम् प्रधान मंत्री के पास आम आदमी से हट कर कोई सुपर पॉवर है तो वो ये गेजेट है।

अब वापिस आते हैं वोट वापसी की अधिकार पे।

वोट वापसी अधिकार की पहली बार मांग महात्मा सच्चिदानंद सन्याल ने अपनी पार्टी HSRA के मैनीफेस्टो में कि थी – उनका कहना था कि बिना वोट वापसी यानी राइट टू रिकॉल के लोकतंत्र एवम् आज़ादी मजाक बन के रह जाएगा।

वोट वापसी की मांग हम करते है वोट वापसी पासबुक कानून की मांग के द्वारा।

कैसे करते हैं?

हर महीने की पांच तारीक को प्रधानमंत्री जी को वोट वापसी कानून के प्रस्तावित ड्राफ्ट की एक कॉपी भेज के। ये मांग हम स्लोगन, नारे बाजी, धरने बाजी से नहीं बल्कि बाकायदा कानून का ड्राफ्ट भेज के करते हैं। आप सोच सकते है कि जो हवा में नहीं बल्कि बाकायदा कानून का ड्राफ्ट देकर अपनी मांग रख रहा हो वो अपनी मांग को लेकर अत्यधिक गंभीर है।

इसके अलावा हम अगर कानून का ड्राफ्ट नहीं भेज सकते तो कम से कम हर महीने की पांच दिनांक को हम एक पोस्टकार्ड भेजते है जिसपे हम अपनी मांग, उसका हैशटैग एवम् अपना वोटर आईडी लिख कर भेजते है। इसकी एक फोटोकॉपी हम एक रजिस्टर में भी रखते हैं जिसका नाम है ” प्रधानमंत्री जी को मेरे द्वारा लिखे गए खत एवम् मेरी मांग”.

इससे क्या बदलाव आयेगा?

वोट लेकर पांच साल तक सत्ता का सुख भोगने, भ्रष्टाचार करने के दिन लद जाएंगे। अब जिला स्तर पे जिला एसपी, जिला स्वास्थ्य अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी आदि अगर जिले में क्राइम बढ़ रहा है, अगर जिले के सरकारी डिस्पेंसरी हस्पताल खराब है, अगर जिले के सरकारी स्कूलों की हालत खराब है, और प्राइवेट स्कूल मनमानी करते हैं तो इं सभी समस्याओं को अगर जिला अधिकारी सही से मैनेज नहीं करता, तो जनता कलेक्टर के पास जाकर अपना वोट वापिस लेने का आवेदन देगी। जिसकी एंट्री वोट वापसी पासबुक। मेहो जाएगी। अगर किसी जिले के नागरिक पचास प्रतिशत से उपर के वोट वापिस लेने का आवेदन डे देते हैं तो मुख्य मंत्री उस एसपी, शिक्षा अधिकारी, एवम् स्वास्थ्य अधिकारी आदि को नौकरी से निकाल, किसी दूसरे को नौकरी पे रख सकते हैं। पर खुशी कि बात ये है कि ऐसी नौबत नहीं आयेगी, क्यूंकि नौकरी खोने की तलवार सर पे लटक रही होगी तो पचास प्रतिषत तो क्या पांच प्रतिशत वोट वापसी की मांग होते ही, अधिकारी लाइन पे आ जाएंगे और अपना काम जनता के लिए करेंगे ना कि अपने ऊपर वालों को खुश रखने के लिए।

इसी में जिला जज भी शामिल है एवम् कुछ अन्य जिला अधिकारी। इस कानून का नाम है #रेगो – राइट टू एक्सपेल गवर्मेंट ऑफिसर”.

इस कानून को और बेहतर समझने के लिए इसके ड्राफ्ट को समय निकाल के पढ़े।

ये कानून का सार है, पर अगर आप इसके बारे में पहली बार सुन रही हैं तो शायद आपके मन में बहुत से प्रश्न उठे, तो कृपा का यूं प्रश्नों को यहां लिखे, समय मिलते ही मै उतर दूंगी।

आज की प्रशासन व्यवस्था को बेहतर करने का इससे अधिक कोई और उपए नहीं।

कानून का ड्राफ्ट यहां पढ़े –
Tinyurl.com/JilaJuryCourt

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