🙏सरल-सादा जीवन ही योग साधना है🙏 (यह आलेख आपके लिए ज़रूरी है, आग्रह है थोड़ा समय निकालकर अवश्य पढ़िएगा🙏🌹)

प्रिय आत्मीय ,
🙏सरल-सादा जीवन ही योग साधना है🙏
(यह आलेख आपके लिए ज़रूरी है, आग्रह है थोड़ा समय निकालकर अवश्य पढ़िएगा🙏🌹)
आइए आज हम योग पर चर्चा करते हैं जो बहुत सरल है, नैसर्गिक है जबकि अक्सर लोग इसे कठिन मानते हैं या समझने में भूल करते हैं ।
योग का एकमात्र अर्थ (गणित , विज्ञान , जीवन, धर्म , अध्यात्म सब में ) है जोड़ना , जुड़ना ,जोड़ते/जुड़ते चले जाना. जब हम समस्त परिवार , समाज , प्रकृति , देश धरती और सृष्टि से जुड़ाव महसूस करते हैं तब हम योग कर रहे होते हैं .
और इस योग का कीमिया या फेविकोल है संवेदना .जब हम सबके सुख-दुःख को अपना समझते हैं तभी हमारा सबसे जुड़ाव होता है .हमारा हाथ तभी बाकी शरीर से स्वस्थ रूप से जुड़ा है जब वह बाकी शरीर के प्रति संवेदनशील है.यदि वह बाकी शरीर के प्रति संवेदनशील नहीं है तो या तो बीमार है उसे लकवा हो गया है या वह बाकी शरीर से अलग हो गया है ,अब जुड़ा ही नहीं है. तो योग का वास्तविक अर्थ है सबसे जुड़ना ,जुड़ाव महसूस करना संवेदना के साथ,संवेदना के द्वारा .और इसका उल्टा है बांटना ,बंटना ,बांटते चले जाना तरह तरह के खांचों में ,जाति के ,धर्म के ,क्षेत्र के , कार्य के और न जाने कितने अनगिनत खांचे .
बहुत से लोग जीवन और अध्यात्म को अलग अलग मानते हैं, लेकिन योग को आत्मसात कर लेने पर ये स्पष्ट हो जाता है कि दोनों एक ही हैं, बस नज़रिया अलग अलग है ।

मेरी एक छोटी सी कविता है –

‘अनंत होकर भी
सीमित महसूस करते हुए व्यवहार करना
जीवन है ।
और सीमित होकर भी
अनंत महसूस करते हुए व्यवहार करना
अध्यात्म है ।’
🙏🙏🌹🌹

एक मित्र ने पूछा ईश्वर पाने का मार्ग क्या है ? क्या सत्य आचरण ही ईश्वर को पाने का मार्ग है ? या क्या गायत्री मंत्र ईश्वर को पाने का मार्ग है ? मैंने लिखा आइए पहले हम ये जान लें की ईश्वर या ब्रह्म क्या है ? उसका हमारा रिश्ता क्या है ? फिर शायद मार्ग की ज़रूरत ही न रह जाए !
आइए ये कविता आत्मसात करें-

“दर्द से अहम् ब्रह्मास्मि

ईश्वर ने वह सबसे बड़ी निधि
सबसे बड़ा उपहार
जो हमें दिया है
जिसकी वजह से हमारा शरीर
वैसे ही बना हुआ है
जैसा कि था जन्म के समय में;
हाँ थोडा बहुत बढ़ जरुर गया है;
लेकिन अनुपात वही है;
वह निधि है पीड़ा, दर्द.
दर्द महसूस होता है
इसलिए हम छेडछाड नहीं करते
शरीर को दर्द महसूस होता है
इसलिए हम बचने की कोशिश करते है
देखभाल करते हैं.
जहाँ पीड़ा नहीं महसूस होती
हम अहंकार के नाम पर
अलग दिखने के नाम पर
क्या क्या भेष और स्वांग बनाते हैं
बालों को काटने में दर्द नहीं होता
तो कितने कितने चित्र विचित्र
बालों के स्वरुप मिलते हैं,
डिज़ाइन मिलती हैं.
यदि शरीर को दर्द नहीं मिला होता
तो आज हमारे सामने
कितने-कितने तरह के शरीर होते
कितने रूप
कितनी डिजाइनें.
तो पीड़ा ने ही हमारे शरीर को सीमा दी है,
विस्तार दिया है,
और परिभाषा दी है.
हमारा शरीर वहां तक है
हम वहां तक हैं
जहाँ तक हमें पीड़ा महसूस होती है.
यदि अब हम अपने शरीर से बाहर की यात्रा करें
तो दर्द की जगह पर वह ईश्वरीय उपहार का रूप ले लेता है
संवेदना का, दूसरे का दर्द महसूस करने की क्षमता का.
हम जिसका भी दर्द महसूस करते हैं
वह हमारे शरीर का हिस्सा हो जाता है,
हमारा विस्तृत शरीर हो जाता है.
हमारा विस्तार वहां तक है
हम वहां तक हैं
हमारा विराट शरीर वहां तक है
जहाँ तक की संवेदना हमें महसूस होती है.
यदि हम अपनी संवेदना के विस्तार को बढ़ाते जाएँ
यहाँ तक की
सारा समाज, सारे लोग
सारा विश्व, पूरी प्रकृति
और सारा ब्रम्हांड उसमे शामिल हो जाए
सबकी संवेदना म महसूस कर सकें
सबसे जुड़ाव हम महसूस कर सकें
तो पूरा ब्रम्हांड हमारा शरीर हो जाता है
हमारा विस्तार हो जाता है;
और फिर हम महसूस कर सकते हैं
अहम् ब्रह्मास्मि.
हम ब्रम्ह हैं
हम ब्रम्हांड हैं.”(मेरे कविता संग्रह ‘धरती जानती है’ से)
🌎🌹🙏

अर्थात ईश्वर एक विराट जीवंत शरीर है और हम उसके जीवंत अंग! फिर मार्ग की ज़रूरत होगी ? आपकी ऊँगली आपका अंग है , आपको पाने के लिए उसे किसी मार्ग की आवश्यकता होगी? वह तो हमेशा आपको पाए ही हुए है और आप भी उसको पाए ही हुए हैं ।
मेरी इस कविता का ध्यान करिए-

“साधना की पूर्णता

जब हम ईश्वर के किसी अंश को
पाने की कोशिश कर रहे होते हैं
तो हमें साधना करनी पड़ती है ।
लेकिन जब हम
पाना चाहते हैं सम्पूर्ण ईश्वर को
तो हमें कोई साधना नहीं करनी पड़ती
उसे तो हम हमेशा पाए ही हुए हैं ;
ठीक वैसे ही जैसे यदि हम
धरती के किसी खंड को पाना चाहें
तो हमें साधना करनी पड़ेगी ,
लेकिन यदि हम पूरी धरती को पाना चाहें
तो हम जहाँ भी है जैसे भी हैं पाए ही हुए हैं।”
(मेरे कविता संग्रह ‘धरती जानती है’ से)
🙏🙏🌹🌹

बस एहसास करना ही पाना है ।
और उस एहसास के बाद असत्य आचरण असम्भव है ।
गायत्री मंत्र उस एहसास तक पहुँचाता है ।
ईश्वर का विशुद्ध विज्ञान स्वरूप होना यही है कि वह एक विराट क्रिया मय स्वरूप है जिसमें सृष्टि , ऊर्जा (शक्ति)और काल सभी कुछ शामिल हैं और उसके अंग के रूप में हम भी शामिल हैं।

आजकल हम शारीरिक क्रियाओं को जिन्हें आसन कहा जाता है उन्हें ही योग समझने की भूल कर रहे हैं . आसन तो पतंजलि के द्वारा समाधि की अवस्था तक की यात्रा का एक कदम हैं जिसके माध्यम से शरीर को शुद्ध और स्वस्थ रखने में मदद मिलती हैं । हाँ आसन करते समय अगर समस्त ब्रह्माण्ड से जुड़े होने का या उस तरफ़ अग्रसर होने का भाव भी मानसिक रूप से चलता रहता है तो वह मात्र आसन न रहकर योगासन हो जाता है।

योग को समझने के बाद ही ज्ञान योग ,भक्ति योग और कर्म योग का वास्तविक अर्थ समझ में आता है .दरअसल जब ज्ञान,भक्ति या कर्म सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण के लिए सम्पूर्ण सृष्टि से जुड़े होने के भाव के साथ होते/किए जाते हैं तभी वे ज्ञानयोग ,भक्ति योग और कर्म योग होते/ बनते हैं।अन्यथा वे महज़ ज्ञान, भक्ति और कर्म ही होकर रह जाते हैं ।

अपनी बुद्धि द्वारा सृष्टि में व्याप्त एकात्म का एहसास ,पूरी सृष्टि एक विराट जीवंत शरीर है और हम उसके जीवंत अंग है इस सच्चाई का एहसास ही ज्ञान योग है.
पूरी सृष्टि के प्रति प्रेम, समर्पण ,श्रद्धा, संवाद और संवेदना का भाव रखना ही भक्ति योग है .
पूरी सृष्टि के प्रति संवेदनात्मक जुड़ाव महसूस करते हुए कार्य करना ,सर्व हित में कार्य करना ,सबके सुख दुःख को समझना ,सबका ध्यान रखना,किसी को विरोधी न मानना ,किसी को पीड़ा न पहुंचाते हुए यथासंभव जीवन यापन करना ,यही कर्म योग है.
वास्तव में ज्ञानयोग ,भक्तियोग और कर्मयोग तीनों ही एक दूसरे के पूरक हैं और जीवन में पूर्णता और आनंद तभी आता है जब तीनो योगों को समझा और और उन पर एक साथ अमल किया जाता है .
योग का अपने अंदर घटित कर लेने के बाद व्यक्ति की जीवनशैली कैसी हो जाती है वह संत कबीर के इस पद में देखिए –

  “साधो सहज समाधि भली,
    गुरू प्रताप जा दिन से जागौ, दिन-दिन अधिक चली।
    जहँ-जहँ डोलौं सो परिकरमा, जो कुछ करौं सो सेवा ।
    जब सोवौं तब करौं दण्‍डवत, पूजौं और न देवा ।
    कहौं सो नाम, सुनौं सो सुमिरन, खाव-पियौ सो पूजा ।
    गिरह-उजार एक सम लेखो, भाव मिटावहु दूजा ।
    आँख न मूदौं; काम न रूँधौं, तनिक कष्‍ट नहिं धारौं।
    खुले नैन पहचानौं हँसि-हँसि, सुन्‍दर रूप निहारौं।
    शब्‍द निरन्‍तर से मन जागा, मलिन वासना त्‍यागी।
    उठत-बैठत कबहु न छूटै, ऐसी तारी लागी।
    कहैं कबीर यह उन्‍नमन रहनी, सो ही परगट गाई।
    सुख-दुख से कोई परे परमपद, तेहि पद रहा समाई।
🙏🙏🌹🌹
-सन्‍त कबीर    
कबीर के इस पद का भाव या मूल मंत्र है दृष्टि की सम्पूर्णता और विशालता और जीवन की सहजता और सरलता ।सादा जीवन , सादा विचार और सहज दृष्टि । जब दृष्टि सहज होती है ,सरल होती है तो स्वतः ही सब कुछ दिखने लगता है ;संपूर्णता और विशालता अपने आप उसमें आने लगती है।
भाव यह है कि सहज समाधि बहुत भली है, प्यारी है , ज़रूरी है ।किसी गुरु , सत्संग या आंतरिक साधना से जब हम जाग जाते हैं, आँखें खुल जाती हैं , आँखों की पट्टियाँ हट जाती हैं तो इसका अभ्यास होता ही होता जाता है और ये ख़ुद ही बढ़ती चली जाती है , सघन होती चली जाती है।
तब हम जहाँ जहाँ चल रहे हैं ,जो जो यात्राएं कर रहे हैं सब उसी विराट सम्पूर्ण ईश्वर की परिक्रमा बन जाती है ,जो कुछ भी इस शरीर से करते सब उसी की सेवा बन जाता है।
जब सोते या लेटते हैं तो वह दंडवत हो जाता है ;और फिर किसी छोटे या सीमित देवता की नहीं बल्कि उस संपूर्ण ईश्वर की ,विराट ईश्वर को ही पाने और पूजने की भावना रहती है , उसी को पूजते हैं ।
गृहस्थ और संन्यासी दोनों में भेद नहीं दिखता , सब एक जैसे दिखने लगते हैं ।और परायेपन का भाव ख़त्म हो जाता है,पूरी सृष्टि पूरा ब्रम्हाण्ड पूरा समाज ,प्रकृति ,धरती सब अपने ही लगने लगते हैं।परायेपन का भाव तिरोहित हो जाता है।
तब आँख नहीं बंद करनी पड़ती,आंखें खुली रहती हैं ।योग साधना करने के लिए ,ध्यान करने के लिए आँखों को बंद करने की आवश्यकता नहीं रहती है।और कोई काम भी बंद नहीं करते ।सारा काम,सब कुछ , सारी लौकिक क्रियाएँ करते हुए भी योग साधना चलती रहती है ।और कोई कष्ट भी , अनावश्यक कष्ट भी अपने शरीर को नहीं देते।सहज रूप से शरीर की देखभाल करते हैं और शरीर भी सहज रूप में अपनी क्रियाएं करता रहता है ।अनावश्यक शरीर को कष्ट देने की आवश्यकता नहीं रहती।
खुली हुई आँखों से अंदर अंदर भाव विभोर होते हुए , हंसते-मुस्कराते हुए जो भी दिख रहा है उसको पहचानते हैं ,पहचानने की कोशिश करते हैं ;क्योंकि उस सबके वाह्य आवरण के अंदर/ भीतर वही विराट सर्वव्यापी ईश्वर दिख रहा होता है ,और उसके सुन्दर रूप को निहारते रहते हैं ,मगन होते रहते हैं।
योग साधना के उन भावों और शब्दों में लगातार डूबे रहने से ,लगातार अभ्यास से ही मन जाग उठता है और स्वतः ही मलिन वासनाएँ ,गंदी वासनाएँ,अनावश्यक वासनाएँ ख़त्म होने लगती हैं,तिरोहित होने लगती हैं।यहाँ ध्यान देने की बात है कि सारी वासनाओं की वर्जना नहीं है ;केवल मलिन वासना जो गंदी वासनाएँ हैं ,जो अनावश्यक वासनाएँ हैं ;जो सम्पूर्णता के एहसास के लिए,सम्पूर्णता से जुड़ाव के लिए नुक़सानदेह है उन्हीं वासनाओं का त्याग करना है ।
ये योग साधना जब और सघन होती है तो यह लगातार चलती रहती है ,उठते बैठते कभी छूटती नहीं है ,इसकी लगन लग जाती है ।यह हमारे पूरे व्यक्तित्व, जीवन और कार्य शैली को आच्छादित कर देती है।
कबीर दास कहते हैं कि यह जो उन्मन रहने की, जीवन की शैली है , अपने व्यक्तिगत मन से परे उस समष्टि के साथ जुड़ाव के एहसास के साथ रहने की शैली है उसे स्पष्ट रूप से वही समझ सकता है ,वही गा सकता है , वर्णन कर सकता जो सुख और दुख दोनों के एहसास से थोड़ा ऊपर उठकर परम पद अर्थात निर्विकार और सम्पूर्णता से उपजे हुए और जुड़े हुए आनंद की अवस्था में स्थित हो गया हो ,उसी आनंद में डूबा रहता हो।(इस आनंद और सुख दुःख के बीच क्या सम्बन्ध है इस पर विस्तार से चर्चा फिर कभी.)
🙏🙏🌹🌹

  • गिरीश पाण्डे
    9-6-2020
Bindesh Yadavhttps://untoldtruth.in
CEO& Owner of Untold Truth "Stop worrying what you have been Loss,Start Focusing What You have been Gained"

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